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सिनगार - प्रकरण २८ | Singaar prakaran 28

बरनन कराए मुझपे, हकें सब अपने अंग । सो विध विध विवेक सों, सो गाया दिल रूह संग ॥१॥

जो जोरा होए इस्क का, तो निकसे ना मुख दम । सो गाए के इस्क गमाइया, जोरा कराया इलम ॥२॥

इलम दिया याही वास्ते, कहूं जरा न रही सक । अव्वल से आज लगे, ऐसा कराया हक ॥३॥

इस्क हमसे जुदा किया, दिया दुनी को सुख कायम । वचन गवाए हम पे, जो हमेसगी दायम ॥४॥

नैन श्रवन या रसना, जो अंग किए बरनन । तिन इस्क देखाया हक का, और देख्या न या बिन ॥५॥

जो अंग देखे आखिर लग, तिन से देखे चौदे तबक । और काहूं न देख्या कछूए, बिना हक इस्क ॥६॥

बूझी तुमारी साहेबी, दिया सब अंगों इस्क देखाए । तुमारे हर अंगों ऐसा किया, रहे चौदे तबक भराए ॥७॥

रसनाएं इस्क देखाइया, तिन भरया जिमी आसमान । इस्क बिना न पाइए, बीच सकल जहान ॥८॥

सब अंग देखे ऐसे हक के, ऐसा दिया इलम । हक इस्क सबों में पसरया, इस्क न जरा मांहें हम ॥९॥

यों हर अंग हक के, सब सो ए किए रोसन । आसमान जिमी के बीच में, कछू देख्या न इस्क बिन ॥१०॥

इस्क हमारा हक सों, दिया हुकमें आड़ा पट । हक का इस्क हम सों, किया दुनियां में प्रगट ॥११॥

यों हाँसी हम पर करी, बनाए हमारे अक्स । इस्क लिया खैंच के, होसी एही हाँसी बीच अर्स ॥१२॥

हक फेर फेर ऊपर जगावहीं, बिना हुकम न जागे अंदर । फेर फेर बड़ाई मांगें इत, हक हॉंसी करें इनों पर ॥१३॥

मांगे दुनी में हक लज्जत, सो भी बुजरकी वास्ते । इलमें हुए यों बेसक, एक जरा न दुनियां ए ॥१४॥

यों जान मांगें फना मिने, लज्जत दुनी में हक । यों हुकम हाँसी करावहीं, दे अपना इलम बेसक ॥१५॥

आप मंगावें आप देवहीं, ए सब हाँसी कों । ए सब जानें मोमिन, सक नहीं इनमों ॥१६॥

कैयों पेहेचान होवहीं, कैयों नहीं पेहेचान । सो सब होत हाँसीय को, करत आप सुभान ॥१७॥

ए किया वास्ते इस्क बेवरे, सो इस्क न आया किन । काहूं जोस जरा आइया, काहूं जरा न किस तन ॥१८॥

वास्ते रब्द इस्क के, जो किया बीच खिलवत । सो हुकम आड़ा सब दिलों, तो इस्क न काहूं आवत ॥१९॥

इलम दिया सबन को, किया अर्स दिल मोमिन । दूर कर सब हिजाब, आप आए अर्स दिल इन ॥२०॥

पेहेचान सब अर्सों की, अर्सों बीच की हकीकत । सो जरा छिपी ना रखी, सब दई हक मारफत ॥२१॥

पर इस्क न दिया आवने, वास्ते रब्द के । हक आए इस्क क्यों न आवहीं, किया हुकमें हाँसी को ए ॥२२॥

रूहों लज्जत मांगी हकपे, अर्स की दुनियां मांहें । तो इलम दिया सबों अपना, बिना इलम लज्जत नाहें ॥२३॥

जो हक देवें इस्क, तो इस्क देवे सब उड़ाए । सुध न लेवे वार पार की, देवे वाहेदत बीच डुबाए ॥२४॥

जब इलम सबों आइया, सो कछू सखती देवे दिल । तिन सखती तन अर्स की, पाइए लज्जत असल ॥२५॥

हुकम मांगे देवे हुकम, सो सब वास्ते हाँसी के । ए बातें होसी सब खिलवतें, इस्क रब्द किया जे ॥२६॥

अनेक हकें हिकमत करी, जो इन जुबां कही न जाए । होसी हाँसी सबों अर्स में, जब करसी बातें बनाए ॥२७॥

हकें किया सब हाँसीय को, जो जरे जरा मांहें खेल । इस्क रब्द के कारने, तीन बेर आए मांहें लैल ॥२८॥

हक हाँसी बातें जानें हक, या जाने हक इलम । इन इलमें सिखाई रूहों, सो बातें अर्स में करसी हम ॥२९॥

एही खुलासा सब बात का, हकें किया हाँसी को । रेहेता रब्द रूहों इस्क का, सब केहेतियां बड़ा हम मों ॥३०॥

याही वास्ते खेल देखाइया, इस्क गया सबों भूल । फेर के सब सुध दई, भेज फुरमान रसूल ॥३१॥

इनमें इसारतें रमूजें, सो खोल न सके कोए । कुंजी भेजी हाथ रूहअल्ला, इमाम हाथ खोलाया सोए ॥३२॥

हाँसी याही बात की, किए सब खेल में खबरदार । तो भी इस्क न आवत, हुई हाँसी बे-सुमार ॥३३॥

हक इस्क जाहेर हुआ, खेल मांहें दम दम । और न चौदे तबकों, बिना इस्क खसम ॥३४॥

ऐसा इलम हकें दिया, हुआ इस्क चौदे भवन । मूल डार पात पसरया, नजरों आया सबन ॥३५॥

तले सात तबक जिमीय के, या बीच ऊपर आसमान । मूल बिरिख पात फूल फैलिया, सब हुआ इस्क सुभान ॥३६॥

नजरों आया सबन के, जब पसरया ए इलम । तब और न देखे कछू नजरों, बिना इस्क खसम ॥३७॥

हकें अर्स कह्या दिल मोमिन, ऐसी दई बुजरकी रूहन । ढूंढ़ ढूंढ़ थके चौदे तबकों, पर बका तरफ न पाई किन ॥३८॥

तबक चौदमें मलकूत, ला हवा सुन्य तिन पर । ता पर बका नूरमकान, जो नूरजलाल अछर ॥३९॥

कई ऐसे खेल पैदा फना, होंए नूरजलाल के एक पल । इन कादर की कुदरत, ऐसा रखत है बल ॥४०॥

तरफ अर्स अजीम की, कोई जाने ना एक नूर बिन । पर गुझ मता न जानहीं, जो है नूरजमाल बातन ॥४१॥

सो गुझ हक हादीय का, दिया खेल में बीच मोमिन । तो दिल अर्स किया हकें, जो अर्स अजीम में इनों तन ॥४२॥

हकें अर्स की सुध सब दई, पाई हकीकत मारफत । हक हादी रूहें खिलवत, ए बीच असल वाहेदत ॥४३॥

कहे हुकमें महामत मोमिनों, हक इस्क बोले बेसक । इस्क रब्द वाहेदत में, हक उलट हुए आसिक ॥४४॥

॥ प्रकरण ॥२८॥ चौपाई ॥२०६९॥

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