सिनगार - प्रकरण २९ | Singaar prakaran 29
हक मेहेबूब के जवाब
रूहों मैं रे तुमारा आसिक, मैं सुख सदा तुमें चाहों । वास्ते तुमारे कई विध के, इस्क अंग उपजाओं ॥१॥
मैं आसिक तुमारा केहेलाया, मैं लिखे इस्क के बोल । मासूक कर लिखे तुमको, सो भी लिए ना तुम कौल ॥२॥
अव्वल बीच और आखिर, लिखे तीनों ठौर निसान । ए बीतक हम तुम जानहीं, भेजी तुमको पेहेचान ॥३॥
दो बेर दुनियां नई कर, किन दो बेर डुबाई जहान । तुमको लैलत कदर में, दो बेर किन बचाए तोफान ॥४॥
फेर तीसरी बेर दुनी कर, जिनमें होसी फजर । सब विध बेसक करके, तुमें खेल देखाया और नजर ॥५॥
तुम जो अरवाहें अर्स की, साथ हक जात निसबत । ए जो दोस्ती हक हमेसगी, बीच खिलवत के वाहेदत ॥६॥
कोई तरफ न जाने अर्स की, तो मुझे जाने क्यों कर । नूरजलाल नूर मकाने, एक इने मेरे तरफ की खबर ॥७॥
दूजा तरफ तो जानहीं, कोई और ठौर बका होए । नाहीं क्यों जाने तरफ है की, किन ठौर से तरफ ले कोए ॥८॥
खेल कई कोट एक पल में, देख उड़ावे पैदा कर । ऐसी कुदरत नूरजलालपे, नूर-मकान ऐसा कादर ॥९॥
ए बातून जो मेरे अर्स का, सो सुध नूर को भी नाहें । मेरी गुझ अर्स जो खिलवत, तुम इन खिलवत के मांहें ॥१०॥
दोस्ती हक हमेसगी, क्यों भुलाए दई मोमिन । तुम जो रूहें अर्स की, मेरे अर्स के तन ॥११॥
अंग हादी मेरे नूर से, तुम रूहें अंग हादी नूर । तो अर्स कह्या तुम दिल को, जो रूहें वाहिद तन हजूर ॥१२॥
और भी लिख्या महंमद को, आसमान से तेहेतसरा । ए बहुविध बेहेरूल हैवान, जल सिर लग कुफर भरया ॥१३॥
कई विध के मांहें हैवान, कई जिन देव इन्सान । बीच मरजिया होए काढ़ी सीप, मिने मोती महंमद पेहेचान ॥१४॥
सो तुम अजूं न समझे, मैं कर लिख्या मासूक । ए सुकन सुन तुम मोमिनों, हाए हाए हुए नहीं टूक टूक ॥१५॥
बसरी मलकी हकी लिखी, आई महंमद तीन सूरत । एक अव्वल दो आखिर, सो वास्ते तुम उमत ॥१६॥
बंदगी मजाजी और हकीकी, ए जो कहियाँ जुदियां दोए । एक फरज दूजा इस्क, क्यों न देख्या बेवरा सोए ॥१७॥
ए जो फरज मजाजी बंदगी, बीच नासूत हक से दूर । होए मासूक बंदगी अर्स में, कही बका हक हजूर ॥१८॥
दोस्ती कही हक की, तिन में समनून पातसाह । पातसाह कौन होए बिना मासूक, देखो इस्म कुरान खुलासा ॥१९॥
अव्वल दोस्ती हक की, लिखी मांहें फुरमान । पीछे दोस्ती बंदन की, क्यों करी न पेहेचान ॥२०॥
मैं कदीम लिखी मेरी दोस्ती, ए किए न सहूर सुकन । तुमको बेसक किए इलम सों, हाए हाए अजूं याद न आवें रूहन ॥२१॥
दोस्त मेरे मोमिन, और मासूक हादी बेसक । तो नाम लिख्या अपना, मैं तुमारा आसिक ॥२२॥
मैं लिख्या है तुम को, जो एक करो मोहे साद । तो दस बेर मैं जी जी कहूं, कर कर तुमें याद ॥२३॥
और भी लिख्या मैं तुमको, मैं करत तुमारी जिकर । मेरी तुम पीछे करत हों, क्यों कर ना देखी फिकर ॥२४॥
ए जो मैं लिखी बुजरकियाँ, सो है कोई तुम बिन । जित भेजों मासूक अपना, जो चीन्हे मेरे सुकन ॥२५॥
मैं किन पर भेजों इसारतें, पढ़ी जाएं न रमूजें किन । तुम जानत हो कोई दूसरा, है बिना अर्स रूहन ॥२६॥
ए जो औलाद आदम की, सब पूजत हैं हवा । सो जाहेर लिख्या फुरमान में, क्या तुम पाया न खुलासा ॥२७॥
ए जो दुनियां खेल कबूतर, तित भी दिए कुलफ दिल पर । पावे हकीकत कलाम अल्लाह की, सो खुले ना लदुन्नी बिगर ॥२८॥
सो तो दिया मैं तुम को, सो खुले ना बिना तुम । जो मेरी सुध दयो औरों को, तित चले तुमारा हुकम ॥२९॥
ए सुकन हकें अव्वल कहे, अर्स में महंमद को । केतेक जाहेर कीजियो, बाकी गुझ रखियो दिल मों ॥३०॥
सरा सुकन कराए जाहेर, गुझ रखे बका बातन । मूंदया रख्या द्वार मारफत का, वास्ते पेहेचान अर्स रूहन ॥३१॥
पट बका किने न खोलिया, कई अवतार हुए तीर्थंकर । हक इलम बिना क्योंए ना खुले, कई लाखों हुए पैगंमर ॥३२॥
अर्स बका पट खोलसी, आखिर बखत मोमिन । साहेब जमाने की मेहेर से, दिन करसी बका रोसन ॥३३॥
राह देखाई तौहिद की, महंमद चढ़ उतर । सो ए तुमारे वास्ते, क्यों न देखो सहूर कर ॥३४॥
और जो पैदा जुलमत से, सो तुम जानत हो सब । ए क्यों छोड़ें हवा को, जिनों असल देख्या एही रब ॥३५॥
इलम लदुन्नी तुमपे, जिन पेहेले पाई खबर । और न कोई वाहेदत बिना, तो इत आवेंगे क्यों कर ॥३६॥
मेयराज हुआ महंमद पर, सो कौल अर्स बका के । सो साहेदी के दो एक सुकन, बीच मुहककों पसरे ॥३७॥
बका सुकन सब मेयराज के, जाहेर किए सब में । सब अर्स बका मुख बोलहीं, और सुकन ना गिरो से ॥३८॥
सो खासी गिरो महंमद की, तामें ए बात होत निस दिन । मुख छोटे बड़े एही सुकन, और बोले न बका बिन ॥३९॥
बका सब्द मुख सब के, सो इलम सब में गया पसर । सब्द फना को न देवे पैठने, ऐसा किया बखत रूहों आखिर ॥४०॥
सब्द फना गए रात में, किया बका सब्दों फजर । कुफर अंधेरी उड़ गई, बोल पाइए न बका बिगर ॥४१॥
ए कह्या था अव्वल, रसूलें इत आए । सो रूहें रूहअल्ला इमाम, फजर करी बनाए ॥४२॥
अव्वल कह्या इलम ल्यावसी, आया तिनसे ज्यादा बेसक । सो नीके लिया मोमिनों, पाई अर्स मारफत हक ॥४३॥
ए इलम लिए ऐसा होत है, आप बेसक होत हैयात । और कायम हुए देखे सब को, पावे दीदार बातून हक जात ॥४४॥
देखी अपनी भिस्त आप नजरों, जो होसी बका परवान । सब करम काटे हक इलम सों, ए देखी बेसक मेहेर सुभान ॥४५॥
हक तरफ जानें नूर अछर, और दूजा न जाने कोए । पर बातून सुध तिन को नहीं, हक इलम देखावे सोए ॥४६॥
कई सुख कायम इन इलम में, आवें न मांहें हिसाब । हक सुराही बका खिलवत में, ए इलम पिलावे सराब ॥४७॥
सो मैं भेज्या तुमें मोमिनों, देखो पोहोंच्या इस्क चौदे तबक । ऐसा इस्क मेरा तुमसों, इनमें पाइए न जरा सक ॥४८॥
यों किया वास्ते ईमान के, आवे आखिर रूहन । सो आए हुआ सबों रोसन, जाहेर बका अर्स दिन ॥४९॥
अव्वल से बीच अब लग, तरफ पाई न बका की । महंमद एता ही बोलिया, जासों ईसा पावें साहेदी ॥५०॥
सो लई रूहअल्ला साहेदी, दूजी साहेदी आप दई । त्यों करी इमामें जाहेर, ज्यों सब में रोसन भई ॥५१॥
लई ईसे महंमद की साहेदी, बका जाहेर किया इमाम । हक हादी रूहन की, करी खिलवत जाहेर तमाम ॥५२॥
इन आखिर दिनों इमाम, बानी बोले न बका बिन । सो सिर ले सुकन गिरोहने, कायम किए सबन ॥५३॥
दुनियां चौदे तबक के, दिए इलमें मुरदे उठाए । ताए मौत न होवे कबहूं, लिए बका मिने बैठाए ॥५४॥
बड़ाई इन इलम की, क्यों इन मुख करों सिफत । सो आया तुममें मोमिनों, जा को सब्द न कोई पोहोंचत ॥५५॥
और सराब मेरी सुराही का, सो रख्या था मोहोर कर । सो खोलने बोहोतों किया, पर क्यों खोलें कबूतर ॥५६॥
सो रख्या तुमारे वास्ते, सो तुमहीं ल्यों दिल धर । लिखे फूल प्याले तुम ताले, अछूत पियो भर भर ॥५७॥
सराब मेरी सुराही का, सो रूहों मस्ती देवे पूरन । दे इलम लदुन्नी लज्जत, हक बका अर्स तन ॥५८॥
जो बैठे हैं होए पहाड़ ज्यों, सो उड़ाए असराफीलें सूर । सूरें खोले मगज मुसाफ के, हुए जाहेर तजल्ला नूर ॥५९॥
तब उड़े काफर हुते जो पहाड़ से, हुए मोमिनों बान चूर । लगे और बान अर्स इलमें, तिन हुए कायम नूर हजूर ॥६०॥
जो लिखी सिफतें फुरमान में, सो सब तुम अर्स रूहन । और सिफत तो होवहीं, जो कोई होवे वाहेदत बिन ॥६१॥
चौदे तबक पढ़ पढ़ गए, किन खोली नहीं किताब । इसारतें रमूजें क्यों खुलें, देखो किन खोलाई दे खिताब ॥६२॥
मुकता हरफ तुम वास्ते, अखत्यार दिया हादी पर । जो चौदे तबक दुनी मिले, तो माएने होए न हादी बिगर ॥६३॥
जाहेर खिताब हादी पर, दिया वास्ते मोमिन । सो मुकता हरफ के माएने, होए न लदुन्नी बिन ॥६४॥
सो दिया लदुन्नी तुम को, तुम खोलो मुकता हरफ । मैं अर्स किया दिल मोमिन, जाकी पाई न किन तरफ ॥६५॥
ए जाहेर तुमारा माजजा, पढ़े हरफ कर पढ़ते थे । ए भेद हक हादी रूहों, बीच खिलवत का जे ॥६६॥
सो रख्या तुमारे वास्ते, ए खोलो तुम मिल । दुनी पावे ना इन तरफ को, सो बीच अर्स तुमारे दिल ॥६७॥
हक बका मता जाहेर किया, पर ए समझया नाहीं कोए । कह्या हरफै के बयान में, बिना ताले न पेहेचान होए ॥६८॥
ए बयान पुकारे जाहेर, इत पोहोंचे ना दुनी सहूर । ए हादी जाने या अर्स रूहें, हक खिलवत का मजकूर ॥६९॥
तरफ भी किन पाई नहीं, पावे तो जो दूसरा होए । तुम तो बीच वाहेदत के, और जरा न कित काहूं कोए ॥७०॥
तुम जानो हम जाहेर, होएं जुदे हक बिगर । हम तुम अर्स में एक तन, तुम जुदे होए सको क्यों कर ॥७१॥
दुनी जुदे तुमें तो जानहीं, जो तुम जुदे हो मुझ सें । हम तुम होसी भेले जाहेर, अपन वाहेदत हैं अर्स में ॥७२॥
मैं तेहेत-कबाए तुमको रखे, कोई जाने ना मुझ बिन । तुमको तब सब देखसी, होसी जाहेर बका अर्स दिन ॥७३॥
जब पेहेले मोको सब जानसी, तब होसी तुमारी पेहेचान । हम तुम अर्स जाहेर हुए, दुनी कायम होसी निदान ॥७४॥
मैं तुमारा मासूक, तुम मेरे आसिक । और तुम मासूक मैं आसिक, ए मैं पुकारया मांहें खलक ॥७५॥
हैं को नाहीं कीजिए, सो तो कबूं न होए । नाहीं को है कीजिए, सो कर न सके कोए ॥७६॥
हक आप काजी होए बैठसी, सो क्या सहूर न किए सुकन । ला सरीक न बैठे किन में, ना कोई वाहेदत बिन ॥७७॥
सहूर बिना सब रेहे गया, और सहूर लदुन्नी मांहें । सो तो सूरत हकीय पे, और वाहेदत बिना कोई नाहें ॥७८॥
चौदे तबक इतना नहीं, जाके कीजे टूक दोए । बिना वाहेदत कछूए ना रख्या, क्यों ना देख्या लिख्या सोए ॥७९॥
दई कुंजी सनाखत तुम को, मैं भेज्या मासूक रसूल । बेसक करियां दे इलम, सो भी गैयां तुम भूल ॥८०॥
तुम बैठे जिमी नासूती, आड़ा मलकूत जबरूत । सात आसमान हवा बीच में, मैं बैठा ऊपर लाहूत ॥८१॥
सो दूर राह आसमान लग, बीच ऐसे सात आसमान । सो भी राह फरिस्तन की, ऊपर जुलमत ला मकान ॥८२॥
नूर-मकान हुआ तिन पर, राह चले ना नूर पर । जित पर जले जबराईल, तित वजूद आदम पोहोंचे क्यों कर ॥८३॥
तित पोहोंच्या मेरा मासूक, कई गुझ बातें करी हजूर । सो फिरया तुम रूहों वास्ते, आए जाहेर करी मजकूर ॥८४॥
मैं तुम पे भेजी रूह अपनी, अपन एते पड़े थे बीच दूर । मैं इलम भेज्या बेसक, तुमें दम में लिए हजूर ॥८५॥
राह सेहेरग सें देखाई नजीक, दई हादिएँ हकीकत । पुल-सरात सें फिराए के, पोहोंचाए अर्स वाहेदत ॥८६॥
ऐसे परदेस में बैठाए के, इन बिध लिखी गुहाए । इन धनी की गुहाई ले ले, हाए हाए उड़त ना अरवाए ॥८७॥
मैं साख देवाई दोऊ हादियों पे, सो तुमें मिले सब निसान । अब तो बोले सब कागद, योंही बोली सब जहान ॥८८॥
अब पांचों तत्व पुकारहीं, आई रोड़े बीच आवाज । सो सब किए तुम कायम, वास्ते तुमारे राज ॥८९॥
इस्क सबों में अति बड़ा, बका भोम चेतन । दायम नजर तले नूर के, पेहेचान सबों पूरन ॥९०॥
सो ए करें तुमारी बंदगी, एही इनों जिकर । इनों सिर हक एक तुम हीं, और कोई ना वाहेदत बिगर ॥९१॥
ए कायम सब आगे ही किए, तुम हादी रूहों वास्ते । जो देखो अन्दर विचार के, तो रूह साहेदी देवे ए ॥९२॥
जिन हरबराओ मोमिनों, हुकम करत आपे काम । खोल देखो आंखें रूह की, जिन देखो दृष्ट चाम ॥९३॥
राज रोज रूहन का, जब पोहोंच्या इत आए । तखत बैठे साह कहावते, देखो क्यों डारे उलटाए ॥९४॥
पैगाम दिए तुम जिन को, जो कहावते थे सुलतान । सो पटके उसी हुकमें, जिन फेरया हादी फुरमान ॥९५॥
भरत खंड सुलतान कहावते, सो दिए सब फंदाए । इन विध उरझे आपमें, सो किनहूं न निकस्यो जाए ॥९६॥
उलट पलट दुनियां भई, तो भी देखत नाहीं कोए । काढ़ ईमान कुफर दिया, ए जो सबे दुनी दीन दोए ॥९७॥
हुकमें वेद कतेब में, लिखे लाखों निसान । सो मिले कौल देखे तुम, हाए हाए अजूं न आवे ईमान ॥९८॥
चाक चढ़ी सब दुनियां, आजूज माजूज हुए जोर । सो तुम अजूं न देखत, एता पड़या आलम में सोर ॥९९॥
हुकम ल्याया जो हकीकत, सो क्यों कर ना देख्या सहूर । ल्याया तुमारे अर्स में, हुकम जबराईल जहूर ॥१००॥
सिजदा जित सरीयत का, तित आए लिखाई पुकार । एते किन वास्ते लिखे, ए तुम अजहूं न किया विचार ॥१०१॥
किन लिखाए सखत सौगंद, जो सरीयत सामी बल । तिन सबको किए सरमिंदे, हाए हाए अजूं याद न आवे असल ॥१०२॥
दुनी बरकत सफकत फकीरों, और अल्ला कलाम । उठाए दुनी से जबराईल, ल्याया अपने मुकाम ॥१०३॥
महंमद मेंहेंदी ईसा अहमद, बड़ा मेला इसलाम । जित सूर फूंक्या असराफीले, होसी चालीस सालों तमाम ॥१०४॥
किन उठाए हिंदू ठौर सिजदे, किन मिलाए आखिर निसान । किन खड़े किए मोमिन, कराए पूरन पेहेचान ॥१०५॥
ए झंडा किने खड़ा किया, ए जो हकीकी दीन । ए लाखों लोक हिंदुअन के, इनको किनने दिया आकीन ॥१०६॥
ए जो द्वार अर्स अजीम का, किन खोल्या कुंजी ल्याए । इलम लदुन्नी मसी बिना, और काहू न खोल्या जाए ॥१०७॥
ए जो बुजरकी महंमद की, मेयराज हुआ इन पर । महंमद साहेदी ईसे मेंहेंदी बिना, कोई दूजा देवे क्यों कर ॥१०८॥
उठे दीन सखत बखत में, पसरया सबों में कुफर । करें रूहें कुरबानी इन समें, ए क्यों होए रसूल रब बिगर ॥१०९॥
किन सुख देखाय अर्स के, बहु विध बिना हिसाब । अनुभव अपना देख के, हाए हाए अजूं न उड़या ख्वाब ॥११०॥
उतर आए कही रूहअल्ला, सुख सब अर्सों हकीकत । पाई हक सूरत की अनुभव, दई निसबत मारफत ॥१११॥
बहु बिध भेज्या फुरमान, तिन में सब अर्सों न्यामत । खिलवत वाहेदत सुध भई, और सुध दई कयामत ॥११२॥
दोऊ हादियों दई साहेदी, मिलाए दिए निसान । तो भी लज्जत ना पाई रूहों नें, हाए हाए जो एती भई पेहेचान ॥११३॥
हौज जोए की साहेदी, और जिमी बाग जानवर । दई जुदी जुदी दोऊ साहेदी, तो भी दिल गल्या नहीं पत्थर ॥११४॥
दोए अर्स कहे दोऊ हादियों, कही अर्सों की मोहोलात । कही अमरद और किसोर, ए अर्स सूरत हक जात ॥११५॥
भेज्या बेसक दारू हैयाती, तुम पे मेरे हाथ हबीब । किए चौदे तबक मुरदे जीवते, तुम को ऐसे किए तबीब ॥११६॥
न थी हिंमत आप उठे की, सो तुम उठाए चौदे तबक । ऐसा किया बैठ नासूत में, तुमें इनमें रही न सक ॥११७॥
ऐसे बेसक होए के, तुमें अजूं न अर्स लज्जत । एता मता ले दिल में, हाए हाए तुमें दरदा भी न आवत ॥११८॥
हाए हाए ए देख्या बल जुलमत का, दिल ऐसा किया सखत । ना तो एक साख मिलावते, अर्स अरवा तबहीं उड़त ॥११९॥
स्याबास तुमारी अरवाहों को, स्याबास हैड़े सखत । स्याबास तुमारी बेसकी, स्याबास तुमारी निसबत ॥१२०॥
धंन धंन तुमारे ईमान, धंन धंन तुमारे सहूर । धंन धंन तुमारी अकलें, भले जागे कर जहूर ॥१२१॥
अर्स बताए दिया तुमको, और बताए दई वाहेदत । सहूर इलम कुंजी सब दई, बैठाए मांहें खिलवत ॥१२२॥
एता मता जिन दिया, तिन आप देखावत केती बेर । पर तुमें राखत दोऊ के दरम्यान, ना तो क्यों रहे मोह अंधेर ॥१२३॥
बड़ाई तुमारी बका मिनें, निपट दई निहायत । तुमें खुदा कर पूजसी, ऐसी और ना काहू सिफत ॥१२४॥
ऐसी हुई न होसी कबहूं, जो तुम को दई साहेबी । ए सुध अजूं तुमें ना परी, सुध आगूं तुमें होएगी ॥१२५॥
तुम खेल में आए वास्ते, करी कायम जिमी आसमान । तिन सब के खुदा तुमको किए, बीच सरभर लाहूत सुभान ॥१२६॥
सो भी पूजें तुमारे अक्स को, तुम आए असल वतन । तिन सबकी लज्जत तुमें आवसी, सब तले तुमारे इजन ॥१२७॥
ए सब बातें ले दिल में, और दिलको लिख्या अर्स । भिस्त करी तुम कायम, होसी तामें बड़ा तुमें जस ॥१२८॥
तुम दई भिस्त बका ब्रह्मांड को, तिनमें जरा न सक । किए नाबूद से आपसे, तो भी गुन जरा न देख्या हक ॥१२९॥
सो तुमें याद आवसी, ओ तुमें करसी याद । तुमें पूजें जिमी बका मिने, अजूं इनका केता ल्योगे स्वाद ॥१३०॥
तुम मांगी है बुजरकी, तिन से कोट गुनी दई । दे साहेबी ऐसे अघाए, चाह चित्त में कहूं न रही ॥१३१॥
क्यों देवें तुमको साहेबी, बीच जिमी फना मिने । तिन से तुमारी उमेदें, होएं न पूरन तिने ॥१३२॥
तुम मांगी बीच ख्वाब के, जित आगे अकल चलत नाहें । धनी देवें आप माफक, याकी सिफत न होए जुबांएँ ॥१३३॥
तुम आए तिन जिमीय में, जिनमें न काहूं सबर । पेहेलें बिन मांगे दई तुमको, अब होसी सब खबर ॥१३४॥
खेल देखाया तिन वास्ते, उपजे तुमको चाह । ए खेल देख के मांगोगे, जानो होवें हम पातसाह ॥१३५॥
सो कई पातसाही जिमी पर, करें पातसाही बीच नासूत । कई तिन पर इंद्र ब्रह्मा फरिस्ते, तापर पातसाह मांहें मलकूत ॥१३६॥
कई कोट मलकूत जात हैं, जबरूत के एक पलक । ए सब पातसाही फना मिने, इनों का खुदा नूर हक ॥१३७॥
नूरजलाल आवे दीदारें, जो अपन बैठे मांहें लाहूत । तिन चाह्या देखों रूहों इस्क, तुमें तो देखाया नासूत ॥१३८॥
तुमें नासूत देख दिल उपज्या, करें पातसाही फना में हम । मैं दई पातसाही बका मिने, सो अब देखोगे सब तुम ॥१३९॥
ए सुध तुमको ना हुती, तो तुम थोड़ा मांग्या निपट । कोट गुना दिया तुमको, खोल देखो अंतर पट ॥१४०॥
जैसी तुमारी साहेबी, करी मेहेर तिन माफक । सुध हुए खुसाली होएसी, जो करी अपने मासूक हक ॥१४१॥
देखो अचरज महामत मोमिनों, जो बेसक हुए हो तुम । तुमें किन दई एती बुजरकी, दिल अर्स कर बैठे खसम ॥१४२॥
॥ प्रकरण ॥२९॥ चौपाई ॥२२११॥
प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन
प्रकरण ४६८, चौपाई १६३७६
॥ सिनगार सम्पूर्ण ॥
