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सिनगार - प्रकरण ५ | Singaar prakaran 5

चरन को अंग तिनमें नख अंग

सखी री तेज भरयो आकास लों, नख जोत निकसी चीर । ज्यों सागर छेद के आवत, नेहेर निरमल का नीर ॥१॥

रंग केते कहूं चरन के, आवें न मांहें सुमार । याही वास्ते खेल देखाइया, रूह देखसी देखनहार ॥२॥

प्यारे पांउं मेरे पिउ के, देख नख अंगूठे अंगुरियों । सो बैठे बीच दिल तखत के, तो अर्स कह्या मेरे दिल को ॥३॥

दो अंगूठे आठ अंगुरी, नख सोभित तिन पर । नख लगते सिर अंगुरी, ए जोत कहूं क्यों कर ॥४॥

चरन अंगूठे पतले, और पतली अंगुरियां । लाल रंग मांहें सोभित, अतंत उज्जलियां ॥५॥

देखूं एक एक अंगुरी, आठों अंगुरी दोऊ पाए । कोमल सलूकी मिल रही, ए छब फब कही न जाए ॥६॥

दोऊ पांउं बड़ी दो अंगुरी, अंगूठों बराबर । तिन थें तीन उतरती, लगती कोमल सुन्दर ॥७॥

झलकत नूर बराबर, ऊपर अंगुरियों नख । सोभा सलूकी नख जोत की, जुबां केहे न सके इन मुख ॥८॥

अतंत जोत नखन की, ताको क्यों कर कहूं प्रकास । केहे केहे मुख एता कहे, जोत पोहोंची जाए आकास ॥९॥

जो सुंदरता अंगुरियों, और सुंदरता नख जोत । ए सोभा न आवे सब्द में, केहे केहे कहूं उद्दोत ॥१०॥

तेज जोत कछू और है, सोभा सुन्दरता कछू और । पर ए अंग नूरजमाल के, याको नहीं निमूना ठौर ॥११॥

जोत में एकै रोसनी, सोभा सुन्दर गुन अनेक । सोभा रंग रोसन नरमाई, रस मीठे कई विवेक ॥१२॥

सोभा मांहें सलूकियां, और खुसबोई सुखदाए । सुख प्रेम कई खुसालियां, इन जुबां कही न जाए ॥१३॥

अर्स बातें सुख बारीक, सुपन बानी न आवे सोए । कछुक जाने रूह अर्स की, जो बेसक जागी होए ॥१४॥

महामत कहे हक हुकमें, ऐसा सुख ना दूजा कोए । पांउं मासूक के आसिक, पिए रस धोए धोए ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥२९१॥

इसी सन्दर्भ में देखें-