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सिनगार - प्रकरण ६ | Singaar prakaran 6

चरन हक मासूक के उपली सोभा

फेर फेर चरन को निरखिए, रूह को एही लागी रट । हक कदम हिरदे आए, तब खुल गए अन्तर पट ॥१॥

गुन केते कहूं इन चरन के, आवें न मांहें सुमार । याही वास्ते खेल देखाइया, रूह देखसी देखनहार ॥२॥

बरनन करत हों चरन की, अर्स सूरत हक जात । ए नेक कहूं हक हुकमें, सोभा सब्द न इत समात ॥३॥

कदम तली अति उज्जल, निपट नरम रंग लाल । रूहें आसिक इन मासूक की, ए कदम छोड़ें ना नूरजमाल ॥४॥

कही सुछम सूरत अमरद की, ए कदम भी तिन माफक । रस रंग सोभा सलूकी, देख अर्स सहूरें हक ॥५॥

लांक सलूकी दोऊ कदम की, लाल एड़ी निपट नरम । गौर रंग रस भरे, जुबां क्या कहे सिफत कदम ॥६॥

सलूकी कदम तलीय की, ऊपर सलूकी और । छब हक कदम की क्यों कहूं, ए जो जुबां इन ठौर ॥७॥

हक हादी रूहें निसबत, ए अर्स की वाहेदत । जो रूह होवे अर्स की, सो क्यों छोड़ें ए न्यामत ॥८॥

ए कदम ताले मोमिन के, लिखी जो निसबत । तो आठों जाम रूह अटकी, बीच अर्स खिलवत ॥९॥

लग रहे हक कदम को, सोई रूह अर्स की । ए रस अमृत अर्स का, कोई और न सके पी ॥१०॥

जो कोई अरवा अर्स की, हक कदम तिन जीवन । सो जीव जीवन बिना क्यों रहे, जाके असल अर्स में तन ॥११॥

हकें अर्स कह्या अपना, जो अर्स दिल मोमिन । सो मोमिन उतरे अर्स से, है असल निसबत तिन ॥१२॥

ए जो मोमिन उतरे अर्स से, अर्स कह्या दिल जिन । हक कदम हमेसा अर्स में, ए कदम छोड़े ना मोमिन ॥१३॥

हकें तो कह्या अर्स दिल को, जो इनों असल अर्स में तन । हक कदम छूटे दिल से, ताए क्यों कहिए मोमिन ॥१४॥

हक कदम मोमिन दिल में, और कदम रूह हिरदे । ए कदम नैन पुतली मिने, और रूह फिरत सिर पर ले ॥१५॥

हकें बैठक कही अपनी, दिल मोमिन का जे । जिन दिल हक आए नहीं, सो दिल मोमिन कहिए क्यों ए ॥१६॥

आसमान जिमी के लोक का, सब्द छोड़े ना सुरिया को । बिन मोमिन सब दुनियां, खात गोते फना मों ॥१७॥

सुरिया पर ला मकान है, तिन पर नूर अर्स । अर्स पर अर्स अजीम, पोहोंचें मोमिन इत सरस ॥१८॥

अर्स दिल मोमिन तो कह्या, अर्स बका सुध मोमिनों में । चौदे तबकों गम नहीं, मोमिन आए हक कदमों से ॥१९॥

सोई कहिए मोमिन, जिन दिल हक अर्स । सो ना मोमिन जिन ना पिया, हक सुराही का रस ॥२०॥

हकें दिल को अर्स तो कह्या, करने मोमिन पेहेचान । कहे मोमिन उतरे अर्स से, तन अर्स एही निसान ॥२१॥

रूहें उतरी अपने तनसे, और कह्या उतरे अर्स से । तन दिल अर्स एक किए, हकें कदम धरे दिल में ॥२२॥

ए निसबत असल अर्स की, हकें जाहेर तो करी । दिल मोमिन अर्स तो कह्या, जो रूहें दरगाह से उतरी ॥२३॥

ख्वाब वजूद दिल मोमिन, हकें कह्या अर्स सोए । अर्स तन मोमिन दिल से, ए केहेने को हैं दोए ॥२४॥

मोमिन असल तन अर्स में, और दिल ख्वाब देखत । असल तन इन दिल से, एक जरा न तफावत ॥२५॥

तो हक सेहेरग से नजीक, ए विध जानें मोमिन । अर्स दिल मोमिन तो कह्या, जो निसबत अर्स तन ॥२६॥

ए बारीक बातें अर्स की, ए मोमिन जानें सहूर । तो हक कदम दिल अर्स में, हक सहूरसे नाहीं दूर ॥२७॥

ए ख्वाब देखे सो झूठ है, सत सोई जो मांहें वतन । सांच बैठी कदम पकड़के, झूठ में न आए आपन ॥२८॥

ए विचार देखो मोमिनों, हक देखावें अपने सहूर । इन दिल को अर्स तो कह्या, जो कदम नहीं आपन से दूर ॥२९॥

जो रूह देखे लांक लीक को, तो रूह तित हीं रहे लाग । अर्स रूहों को इन लीक बिना, सुख दुनियां लागे आग ॥३०॥

एक लीक भी रूहथें न छूटहीं, तो क्यों छूटे तली कोमल । अर्स रूहें इन लीक बिना, तबहीं जाए जल बल ॥३१॥

ए कदम तली की जोत से, आसमान जिमी रोसन । दिल मोमिन कदम बिना, अंग हो जाए सब अगिन ॥३२॥

चकलाई इन कदम की, कदम तली ऊपर सलूक । ए फिराक मोमिन ना सहें, सुनते होंए टूक टूक ॥३३॥

सोभा कदम तलीय की, और सोभा सलूकी नखन । सोभा अंगुरी अंगूठें, क्यों छोड़ें आसिक तन ॥३४॥

फना टांकन की सलूकी, और छब घूंटी काड़ों । अर्स रूहें जुदागी ना सहें, जाके असल तन अर्स मों ॥३५॥

पीड़ी घूंटन पांउं माफक, सोभा अति सुन्दर । ए कदम सुध तिने परे, जो रूह बेधी होए अन्दर ॥३६॥

विचार तो भी याही को, रूह नजर तो भी ए । जो रूह इन कदम की, रहे तले कदमै के ॥३७॥

हाथों कदम न छोड़हीं, रूह हिरदे मांहें लेत । हक कदम खैंचें रूह को, सब अंगों समेत ॥३८॥

जेते अंग आसिक के, सो सब कदमों लगत । ए गत सोई जानहीं, जिन अंग रूह खैंचत ॥३९॥

कई गुन हक कदम में, सब गुन खैंचें रूह को । मासूक गुझ सोई जानहीं, आए लगी जिन सों ॥४०॥

पांउं पीड़ी घूंटन की, जो चकलाई सोभाए । जेते अंग आसिक के, तिन सब अंगों देत घाए ॥४१॥

क्यों कहूं पीड़ीय की, सलूकी सुख जोर । ए सुख सब रगन को, और देत कलेजा तोर ॥४२॥

घाव लगत टूटत रगां, इन विध रेहेत जो याद । मासूक मारत आसिक को, अर्स अंग चरन स्वाद ॥४३॥

ए कदम देखे रूह फेर फेर, तली लांक या ऊपर । दिल मोमिन अर्स कह्या, सो या कदमों की खातिर ॥४४॥

हक कदम अर्स दिल में, सो दिल मोमिन हुआ जल । अरवा मोमिन जीव जल के, सो रूह जल बिन रहे न पल ॥४५॥

ए बेली फूल रूह मोमिन, सो बेल भई हक चरन । बेल जुदागी फूल क्यों सहे, यों कदम बिना रहें ना मोमिन ॥४६॥

जब देखूं कदम रंग को, जानों एही सुख सागर । जब देखूं याकी सलूकी, आड़ी निमख न आवे नजर ॥४७॥

जो आड़ी आवे पलक, तो जानों बीच पड़यो ब्रह्मांड । ए निसबत हक वाहेदत, जो अर्स दिल अखंड ॥४८॥

ए कदम ताले मोमिन के, सो मोमिन हक चरन । तो अर्स कह्या दिल मोमिन, जो रूहें असल अर्स में तन ॥४९॥

सुन्दरता इन कदम की, सो चुभ रही रूह के दिल । अरस-परस ऐसी हुई, एक निमख न सके निकल ॥५०॥

चकलाई इन कदम की, सुख सलूकी देत । हिरदे जो रूह के चुभत, रूह सोई जाने जो लेत ॥५१॥

अति मीठे रसीले रंग भरे, जा को ए चरन मेहेर करत । सुख सोई जाने रूह अर्स की, जिन दिल दोऊ पांउं धरत ॥५२॥

सो पल पल ए रस पीवत, फेर फेर प्याले लेत । ए अमल क्यों उतरे, जा को हक बका सुख देत ॥५३॥

ए सुख कायम हक के, जिन दिल एह कदम । सोई रूह जाने ए जिन लिया, या जानत है खसम ॥५४॥

कई विध के सुख कदम में, मेहेर कर देत मेहेरबान । तो अर्स कह्या दिल मोमिन, इन पर कहा कहे सुभान ॥५५॥

हकें दिल किया अर्स अपना, इन पर बड़ाई न कोए । ए सुख लें मोमिन दुनी में, जो अर्स अजीम की होए ॥५६॥

ए सुख क्या जानें खेल कबूतर, कह्या हक का अर्स दिल । ए जाहेर हुए सुख जानसी, मोमिन मिलावा मिल ॥५७॥

कदम मेहेबूब के मोमिन, क्यों सहें जुदागी खिन । तो हकें कह्या अर्स दिल को, कर बैठे अपना वतन ॥५८॥

दिया मोमिनों बड़ा मरातबा, जेती हक बिसात । ले बैठे मोमिन दिल में, सब मता हक जात ॥५९॥

हक सूरत किन पाई नहीं, ना अर्स पाया किन । तरफ भी किन पाई नहीं, मांहें त्रैलोकी त्रैगुन ॥६०॥

कह्या चौदे तबक जरा नहीं, तो बका सुध होसी किन । हक सूरत अर्स कायम, सब दिल बीच कह्या मोमिन ॥६१॥

हक अंग नूर हादी कह्या, मोमिन हादी अंग नूर । ए सब हक वाहेदत, ज्यों हक नूर जहूर ॥६२॥

ए गुझ थीं अर्स बारीकियां, कोई न जाने बका बात । सो रूहें आए दुनी में प्रगटीं, अर्स बका हक जात ॥६३॥

कहे हुकम नूरजमाल का, मोहे प्यारे अति मोमिन । महामत कहे दोनों ठौर, हमको किए धंन धंन ॥६४॥

॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥३५५॥

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