सिनगार - प्रकरण ७ | Singaar prakaran 7
चरन निसबत का प्रकरण अन्दरतांई
ए क्यों छोड़े चरन मोमिन, जो हक की वाहेदत । आए दुनी में जाहेर करी, जो असल हक निसबत ॥१॥
रूहें उतरीं नूर बिलंद से, कदम नासूत में भूलत । तिन पर रसूल होए आइया, जो असल हक निसबत ॥२॥
रूहें अर्स भूलीं नासूत में, ताए हक रमूजें लिखत । सो सब मोमिन समझहीं, जो असल हक निसबत ॥३॥
रूहें कदम भूली नासूत में, हक ताए भेजे इसारत । ताको हादी केहे समझावहीं, जो असल हक निसबत ॥४॥
रूहें अर्स की कदम भूलियाँ, तिन पर रूह अपनी भेजत । अर्स बातें केहे समझावहीं, जो असल हक निसबत ॥५॥
फरामोस हुइयां लाहूत से, रूहअल्ला संदेसे देवत । ए मेहेर लेवें मोमिन, जो असल हक निसबत ॥६॥
खिताब हादी सिर तो हुआ, जो फुरमान और न कोई खोलत । हक कदम हिरदे मोमिनों, जो असल हक निसबत ॥७॥
रूहें भूलियां खिलवत खेल में, ताए रूहअल्ला इलम ल्यावत । सो कायम करे त्रैलोक को, जो असल हक निसबत ॥८॥
इस्क रब्द हुआ अर्स में, तो रूहें इत देह धरत । रूहें चरन तो पकड़े, जो असल हक निसबत ॥९॥
आए कदम दिल मोमिन, जा को सब्द न पोहोंचे सिफत । हकें अर्स दिल तो कह्या, जो असल हक निसबत ॥१०॥
ए बरनन हुकमें तो किया, जो जाहेर करनी खिलवत । ए कदम रूहें तो पकड़े, जो असल हक निसबत ॥११॥
हकें आए किया अर्स दिल को, बीच ल्याए कदम न्यामत । सिर हुकमें हुज्जत तो लई, जो असल हक निसबत ॥१२॥
अर्स मोहोल दिल को किया, आए बैठी हक सूरत । ए अर्स मेहेर तो भई, जो असल हक निसबत ॥१३॥
इन कदमों मेहेर मुझ पर करी, देखाए दई वाहेदत । तो इलम दिया बेसक, जो असल हक निसबत ॥१४॥
मोमिनों पाई बेसकी, सो इन कदमों की बरकत । सो क्यों छूटें मोमिन से, जो असल हक निसबत ॥१५॥
इन चरनों किया अर्स दिल को, दिल बोलें सुध परत । रूहें तो लेवें महंमद सिफायत, जो असल हक निसबत ॥१६॥
रूहें कदम पकड़ें हक के दिल में, पैठ इस्क ठौर ढूंढ़त । दिल मोमिन अर्स तो कह्या, जो असल हक निसबत ॥१७॥
ए कदम ले दिल मोमिन, अर्स से ना निकसत । ए रूहें जानें अर्स बारीकियां, जो असल हक निसबत ॥१८॥
रूहें सिर पर कदम चढ़ाए के, अर्स मोहोलों में मालत । सब हक गुझ रूहें जानहीं, जो असल हक निसबत ॥१९॥
ले चरन दिल अर्स में, सब गलियों में फिरत । सब सुध होवे अर्स की, जो असल हक निसबत ॥२०॥
रूहें नैन पुतलियों बीच में, हक कदम राखत । एक हुए दिल अर्स रूहें, जो असल हक निसबत ॥२१॥
दिल अर्स किया इन कदमों, इतहीं बैठे कर भिस्त । ए न्यारे निमख न होवहीं, जो असल हक निसबत ॥२२॥
गुन केते कहूं इन कदम के, जिन अर्स अखंड किया इत । ए कदम ताले तिनके, जो असल हक निसबत ॥२३॥
तिन भाग की मैं क्या कहूं, ए जिन दिल कदम बसत । धंन धंन कदम धंन ए दिल, जो असल हक निसबत ॥२४॥
कई मलकूत वारूँ तिन खाक पर, जिन दिल ए कदम आवत । और दिल अर्स न होवहीं, बिना असल हक निसबत ॥२५॥
दिल साँच ले सरीयत चले, या पाक होए ले तरीकत । दिल अर्स न होए बिना मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥२६॥
कोई करो सब जिमिएँ सिजदा, पालो अरकान लग कयामत । पर ए कदम न आवें दिल में, बिना असल हक निसबत ॥२७॥
तेहेत्तर फिरके महंमद के, तामें एक को हक हिदायत । और नारी एक नाजी कह्या, जाकी असल हक निसबत ॥२८॥
उत्तम होए खट करम करो, आचार करो विधोगत । ब्रह्म चरन न आवें ब्रह्मसृष्ट बिना, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥२९॥
खटसास्त्र पढ़ो कांड तीनों, करम निहकरम विधोगत । ब्रह्म चरन न आवें ब्रह्मसृष्ट बिना, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३०॥
नव अंगों पालो नवधा, ल्यो बैकुंठ चार मुगत । ए चरन न आवें ब्रह्मसृष्ट बिना, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३१॥
वेद सास्त्र पुरान पढ़ो, सब पैंडे देखो प्रापत । ए चरन न आवें ब्रह्मसृष्ट बिना, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३२॥
कोई वेद पाँचों मुख पढ़ो, कई त्रैगुन जात पढ़त । पर ए चरन न आवें ब्रह्मसृष्ट बिना, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३३॥
ब्रह्म-सृष्ट कही वेद ने, ब्रह्म जैसी तदोगत । तौल न कोई इनके, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३४॥
सुकजी आए इन वास्ते, ले किताब भागवत । ए चरन न आवें ब्रह्मसृष्ट बिना, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३५॥
ब्रह्म ने भेजी परमहंस पर, वेद अस्तुत बंदोबस्त । ए ब्रह्म चरन क्यों छोड़हीं, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३६॥
कही आई उपनिषद इन पे, पूर्व रिखी कहे जित । धाम बका पाया इनोंने, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३७॥
ब्रह्मसृष्ट मोमिन कहे, रूहें लेवें वेद कतेब विगत । ए समझ चरन ग्रहें ब्रह्म के, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३८॥
ब्रह्मसृष्ट रूहें ना दोए, अर्स रूहें ए जानत । दोऊ जान चरन ग्रहें एकै, जाकी ब्रह्म सों निसबत ॥३९॥
पढ़े वेद कतेब को, जोग कसब ना पोहोंचत । दिल अर्स किया जिन कदमों, ए न आवें बिना हक निसबत ॥४०॥
दिल अर्स कह्या जो मोमिन, सो दिल नाजी पाक उमत । और इलाज ना इलम कोई, बिना असल हक निसबत ॥४१॥
इलम लदुन्नी भेजिया, सो मोमिन ए परखत । परख चरन ग्रहें हक के, जा की असल हक निसबत ॥४२॥
हक हादी की मेहेर से, भिस्त आठ होसी आखिरत । पर ए चरन ना आवें दिल में, बिना असल हक निसबत ॥४३॥
महंमद सूरत हकी बिना, द्वार खुले ना हकीकत । ए कदम पावें दिल औलिया, जाकी असल हक निसबत ॥४४॥
ए कदम आए जिन दिल में, तित आई हक सूरत । ए चौदे तबक पावें नहीं, बिना असल हक निसबत ॥४५॥
दिल मोमिन क्यों अर्स कह्या, ए दुनी ना एता विचारत । ए विचार तो उपजे, जो होए हक निसबत ॥४६॥
रूहें अर्स बुधनी बिना, छल का पावे न कोई कित । ए सहूर भी दिल न आवहीं, बिना असल हक निसबत ॥४७॥
रूहअल्ला दज्जाल को मारसी, छोड़ावसी उमत । कर एक दीन चरन देखावहीं, जाकी असल हक निसबत ॥४८॥
अर्स सूरत पर सिजदा, करसी मेंहेंदी इमामत । कदम ग्रहे देखावहीं, जाकी असल हक निसबत ॥४९॥
दोऊ आए बीच हिंदुअन के, जैसे कह्या हजरत । ए बेवरा सोई समझहीं, जाकी असल हक निसबत ॥५०॥
अर्स कह्या दिल मोमिन, ले दिल अर्स गलियों खेलत । सो पावें रूहें लाहूती, जाकी असल हक निसबत ॥५१॥
ए कदम पावें रूहें लाहूती, नहीं औरों की किसमत । ए सोई पावें हक बारिकियां, जाकी असल हक निसबत ॥५२॥
अहेल किताब एही कहे, एही पावें हक मारफत । एही आसिक होवें मासूक की, जाकी असल हक निसबत ॥५३॥
जो रूहें उतरी अर्स से, सो कदम ले अर्स पोहोंचत । देसी भिस्त सबन को, जाकी असल हक निसबत ॥५४॥
जो रूहें कही लाहूती, इजने इत उतरत । सो पकड़े कदम इस्क सों, जाकी असल हक निसबत ॥५५॥
रूहें अर्स रब्दें इत आइयां, देखो कौन कदम ग्रहे जीतत । सो क्यों बिछुरें इन कदम सों, जाकी असल हक निसबत ॥५६॥
याही रब्दें इत आइयां, लेने पिउ का विरहा लज्जत । सो पाए कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥५७॥
ए रब्द अर्स खिलवत का, रूहें इस्क अंग गलित । सो क्यों छोड़ें पांउं पकड़े, जाकी असल हक निसबत ॥५८॥
रूहें इन कदम के वास्ते, जीवते ही मरत । सो क्यों छोड़ें प्यारे पांउं को, जाकी असल हक निसबत ॥५९॥
याही कदम के वास्ते, रूहें जल बल खाक होवत । तो दिल आए कदम क्यों छूटहीं, जाकी असल हक निसबत ॥६०॥
रूहें होवें जिन किन खिलके, हक प्रगटे सुनत । आए पकड़ें कदम पल में, जाकी असल हक निसबत ॥६१॥
जब आखिर हक जाहेर सुनें, तब खिन में रूहें दौड़त । सो क्यों रहें कदम पकड़े बिना, जाकी असल हक निसबत ॥६२॥
जब इमाम आए सुने, तब मोमिन रेहे ना सकत । दौड़ के कदम पकड़े, जाकी असल हक निसबत ॥६३॥
मलकूत बैकुंठ वास्ते, दुनी पहाड़ से गिरत । तो रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६४॥
मलकूत बैकुंठ वास्ते, दुनी सिर लेत करवत । तो रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६५॥
मलकूत बैकुंठ वास्ते, दुनियां आग पीवत । तो रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६६॥
मलकूत बैकुंठ वास्ते, दुनी भैरव झंपावत । तो रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६७॥
मलकूत बैकुंठ वास्ते, दुनी हेम में गलत । तो रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६८॥
और इलाज जो कई करो, पर पावे ना बिना किसमत । सो हक कदम ताले मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥६९॥
ए बिन मोमिन कदम न पाइए, जो करे कई कोट मेहेनत । ए मोमिन अर्स अजीम के, जाकी असल हक निसबत ॥७०॥
रूहें अर्स की कहें वेद कतेब, बिन कुंजी क्योंए न पाइयत । सो रूहअल्ला बेसक करी, जाकी असल हक निसबत ॥७१॥
हक कदम दिल मोमिन, देख देख रूह भीजत । एक पाउ पल ना छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥७२॥
ए कदम रूहें दिल लेयके, देह झूठी उड़ावत । कोई दिन रखें वास्ते लज्जत, जाकी असल हक निसबत ॥७३॥
मोमिन आए अर्स से, दुनी क्या जाने ए गत । ए कदम ताले ब्रह्मसृष्ट के, जाकी असल हक निसबत ॥७४॥
रूहें खाना पीना रोजा सिजदा, इन कदमों हज-ज्यारत । और चौदे तबक उड़ावहीं, जाकी असल हक निसबत ॥७५॥
ए चरन पेहेचान होए मोमिनों, वाही को प्यारे लगत । ना तो बुरा न चाहे कोई आपको, पर क्या करे बिना हक निसबत ॥७६॥
पाए बिछुरे पिउ परदेस में, बीच हक न डारें हरकत । ए करी इस्क परीछा वास्ते, पर ना छूटे हक निसबत ॥७७॥
जिन परदेस में पांउं पकड़े, ज्यों बिछुरे आए मिलत । सो मोमिन छोड़ें क्यों कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥७८॥
जो बिछुड़ के आए मिले, सो पलक ना छोड़ सकत । जो रूहें पाए चरन पिउ के, जाकी असल हक निसबत ॥७९॥
अर्सें सब्द न पोहोंचे त्रैलोकका, सो दिल मोमिन अर्स कहावत । इन कदमों बड़ाई दिल को दई, जाकी असल हक निसबत ॥८०॥
दिल मोमिन एही पेहेचान, दिल कदम छोड़ न चलत । तो पाई अर्स बुजरकी, जो थी असल हक निसबत ॥८१॥
ए कदम नूरजमाल के, आई दिल मोमिन लज्जत । सो मोमिन अरवा अर्स के, जाकी असल हक निसबत ॥८२॥
ए चरन दिल का जीव है, तिन बिन जीव क्यों जीवत । तो हकें अर्स कह्या दिल को, जो असल हक निसबत ॥८३॥
जो निसबती दिल चरन के, तामें जरा न तफावत । ए कदम रूहें ल्याई दुनीमें, जाकी असल हक निसबत ॥८४॥
हक जाहेर बीच दुनीके, रूहें समझके समझावत । हुआ फुरमाया रसूल का, तो जाहेर हुई हक निसबत ॥८५॥
चौदे तबक करसी कायम, ए जो झूठे खाकी बुत । मोमिन बरकत इन कदमों, जाकी असल हक निसबत ॥८६॥
सबों भिस्त दे घरों आवसी, रूहें कदम ग्रहें बड़ी मत । अर्स के तन जो मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥८७॥
ए काम किया सब हुकमें, अव्वल बीच आखिरत । हक बका द्वार खोलिया, महामत ले आए निसबत ॥८८॥
॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥४४३॥
