सिनगार - प्रकरण ८ | Singaar prakaran 8
कदम परिकरमा निसबत
उमर जात प्यारी सुपने, निस दिन पिउ जपत । लाल कदम न छोड़ें मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥१॥
मांग लई प्यारी उमर, ए जो रब्द के बखत । लाल पांउं तली छोड़ें क्यों मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥२॥
पांउं निस दिन छोड़ें ना मोमिन, सुपने या सोवत । सो क्यों छोड़ें बेसक जागे, जाकी असल हक निसबत ॥३॥
जब उड़ी नींद असल की, हक देखे होंए जाग्रत । सुख लेसी खेल का अर्स में, जाकी असल हक निसबत ॥४॥
दीजे परिकरमा अर्स की, मोमिन दिल ना सखत । सूते भी कदम ना छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥५॥
सुख आगूं अर्स द्वार के, कई बिध केलि करत । सो क्यों छोड़ें चरन हक के, जाकी असल हक निसबत ॥६॥
करें सुपने में कुरबानियां, ऐसे मोमिन अलमस्त । सूते भी कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥७॥
सुपने कदम पकड़ के, तापर अपना आप वारत । हक करें सुरखरू इनको, जाकी असल हक निसबत ॥८॥
लेवें सुख बाग मोहोलन में, मलार में बरखा रूत । रूहें क्यों छोड़ें चरन सुपने, जाकी असल हक निसबत ॥९॥
रूहें खेलें मलार बन में, हक हादी की सोहोबत । ए क्यों छोड़ें चरन मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥१०॥
मोमिन बसें अर्स बनमें, ऊपर चाह्या मेह बरसत । सो क्यों रहें इन पांउं बिना, जाकी असल हक निसबत ॥११॥
रूहें मलार अर्स बाग में, ऊपर सेरड़ियां गरजत । रूहें सुपने पांउं न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥१२॥
रूहें खेलें हक हादी सों बन में, नूर बिजलियां चमकत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥१३॥
हक खेलोंने कई खेलावहीं, कई मोर कला पूरत । सो क्यों छोड़ें पांउं हक के, जाकी असल हक निसबत ॥१४॥
रूहें खेलें अर्स के बाग में, कई पसु पंखी खेलावत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥१५॥
रूहें सुपने दुनी को न लागहीं, जा को मुरदार कही हजरत । ए हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥१६॥
ए रूहें हक हादी संग, विध विध बन विलसत । ए क्यों छोड़ें कदम मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥१७॥
खेलने वाली सातों घाट की, हक प्रेम सुराही पिलावत । रूहें सुपने न छोड़ें कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥१८॥
रूहें सराब हक सुराही का, पैदरपे पीवत । बेहोस हुए न छोड़ें कदम, जाकी असल हक निसबत ॥१९॥
झूलें पुल मोहोल साम सामी, जल बीच मोहोल झलकत । रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२०॥
रूहें रमें किनारे जोए के, हक हादी रूहें झीलत । सो सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२१॥
हक हादी रूहें पाट पर, मन चाह्या सिनगार साजत । रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२२॥
रूहें मिलावा अर्स बाग में, देखो किन विध ए सोभित । रूहें हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२३॥
पसु पंखी बोलें इन समें, कई विध बन गूंजत । रूहें सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२४॥
विध विध के कुन्ज बन में, हक रूहें केलि करत । सो क्यों छोड़ें इन कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥२५॥
बट पीपल की चौकियां, हक हादी रूहें हींचत । रूहें सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२६॥
ताल पाल बन गिरदवाए, ऊपर कई मोहोल देखत । सो क्यों छोड़ें हक कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥२७॥
सोभा चारों घाट की, जित जोए हौज मिलत । रूहें सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥२८॥
ए जो कहे मेहेराव, घाटों ऊपर सोभित । हक कदम हिरदे रूह के, जाकी असल हक निसबत ॥२९॥
खेलें हौज कौसर के बाग में, रूहें बन डारी झूलत । हक चरन सुपने न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥३०॥
रूहें खेलें टापू के गुरज में, जाए झरोखों बैठत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥३१॥
खेलें अर्स हौज टापू मिने, हक भेले चांदनी चढ़त । रूहें क्यों रहें इन कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥३२॥
नेहेरें मोहोल ढ़ांपियां, जल चक्राव ज्यों चलत । मोमिन हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥३३॥
कई मोहोल मानिक पहाड़ में, हिसाब में न आवत । ए मोमिन कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥३४॥
कई ताल नेहेरें मानिक पर, ढ़िग हिंडोलों चादरें गिरत । ए कदम मोमिन क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥३५॥
कई भांतों नेहेरें बन में, सागरों निकस मिलत । मोमिन खेलें कदम पकड़ के, जाकी असल हक निसबत ॥३६॥
कई बड़े मोहोल किनारे सागरों, कई मोहोल टापू झलकत । ए मोमिन कदमों सुख लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥३७॥
आगूं बड़ा चौगान बन बिना, दूब कई दुलीचों जुगत । मोमिन दौड़ के कदम पकड़ें, जाको असल हक निसबत ॥३८॥
हक हादी रूहें इन चौगान में, कई पसु पंखी दौड़ावत । मोमिन लेवें सुख कदमों, जाकी असल हक निसबत ॥३९॥
कहा कहूं बाग अर्स का, जित कई रंगों फूल फूलत । रूहें क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥४०॥
रूहें खेलें फूल बाग में, कई खुसबोए रस बेहेकत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥४१॥
विध विध की बन छत्रियां, जड़ाव चंद्रवा ज्यों चलकत । ए कदम सुख सुपने लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥४२॥
इन बाग तले जो बाग है, ए क्यों कहे जुबां सिफत । ए मोमिन कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥४३॥
मोर चकोर मैना कोयली, कई विध वन टहुंकत । रूहें कदम सुख सुपने लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥४४॥
जो खेलें झीलें चेहेबच्चे, जल फुहारे उछलत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥४५॥
रूहें खेलें लाल चबूतरे, कई रंगों हाथी झूमत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥४६॥
कई बाघ चीते दीपे केसरी, बोलें कूदें गरजत । रूहें क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥४७॥
कई विध बाजे बजावहीं, इत बांदर नट नाचत । रूहें सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥४८॥
कई बड़े पसु पंखी अर्स के, कई उड़ें खेलें कूृदत । रूहें क्यों रहें हक चरन बिना, जाकी असल हक निसबत ॥४९॥
कई विध यों मधुबन में, सुख लेवें चित्त चाहत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥५०॥
बड़े मोहोल जो पहाड़ से, इत रूहें खेलें कई जुगत । सो सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥५१॥
चार मोहोल बड़े थंभ ज्यों, सो ऊपर जाए मिलत । रूहें इत सुख कदमों लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥५२॥
हजार हांसें जित गिरदवाए, बीच मोहोल बड़े बिराजत । इत रूहें सुख लेवें चरन का, जाकी असल हक निसबत ॥५३॥
पहाड़ पुखराजी मोहोलमें, सुख चांदनी लेवत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥५४॥
अति बड़े चार द्वार चांदनी, कई हाथी हलकों आवत । चरन छूटे ना इन खावंद के, जाकी असल हक निसबत ॥५५॥
बड़े पसु पंखी इन चांदनी, हक हादी मोहोला लेवत । रूहें ए चरन क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥५६॥
हाथी बाघ चीते दीपे केसरी, कोई जातें गिन ना सकत । हक कदम रूहें क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥५७॥
ए निपट बड़े मोहोल चांदनी, इत कई मिलावे मिलत । रूहें न छोड़ें हक कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥५८॥
बड़े चार द्वार चबूतरों, क्यों कहूं देहेलानों सिफत । ए सुख लेवें मोमिन कदमों, जाकी असल हक निसबत ॥५९॥
ए अति ऊंचे मोहोल बीच के, हक सुख आकासी देवत । रूहें ए कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६०॥
हक हादी रूहें बड़े मोहोल में, इन गुरजो सुख को गिनत । ए कदम सुख मोमिन जानहीं, जाकी असल हक निसबत ॥६१॥
सुख लेत ताल मूल जोए के, कई विध केलि करत । रूहें क्यों छोड़े हक चरन को, जाकी असल हक निसबत ॥६२॥
मोहोल बड़े ताल ऊपर, रूहें सुख लेवें हक सों इत । ए क्यों छोड़ें हक कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥६३॥
दोनों तरफों मोहोल के, आगूं जित दरखत । सो क्यों छोड़े कदम सुपने, जाकी असल हक निसबत ॥६४॥
दोऊ किनारे गुरज दोए, बीच सोले चादरें उतरत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥६५॥
ऊपर चादरों मोहोल जो, बीच बड़े देहेलान देखत । दोऊ तरफों कदम सुख लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥६६॥
अधबीच में कुंड जो, जित चादरों जल गिरत । रूहें छोड़ें न कदम सुपने, जाकी असल हक निसबत ॥६७॥
तले ताल बन बंगले, जल चक्राव ज्यों चलत । रूहें सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥६८॥
कई फुहारे मुख जानवरों, जल तीर ज्यों छूटत । क्यों भूलें इत सुख कदम के, जाकी असल हक निसबत ॥६९॥
ए जंजीरें जल की, अदभुत सोभा लेवत । क्यों छोड़ें ए कदम मोमिन, जाकी असल हक निसबत ॥७०॥
उलंघ जात कई चेहेबच्चों, जल साम सामी जात आवत । इत कदम सुख मोमिन लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥७१॥
जल आवे जाए ऊपर से, तले हक हादी रूहें खेलत । ए सुख क्यों छूटें कदम के, जाकी असल हक निसबत ॥७२॥
गिरदवाए बड़े द्वार मेहेराबी, ए मोहोल सोभा लेवत । इत खेले रूहें कदम तले, जाकी असल हक निसबत ॥७३॥
इत ताल तले बन छाया मिने, रूहें बीच बगीचों मलपत । ए सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥७४॥
केती चक्राव से बाहेर, जोए तले चबूतरों निकसत । रूहें खेलें तले कदम के, जाकी असल हक निसबत ॥७५॥
जोए चबूतरों कुंड पर, ऊपर बन झूमत । ए कदम सुख मोमिन लेवहीं, जाकी असल हक निसबत ॥७६॥
जमुना जल ढांपी चली, ए बैठक सोभा अतंत । ए सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥७७॥
दोऊ किनारे ढांपिल, आगूं जल जोए खुलत । रूहें क्यों रहें इन कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥७८॥
एक मोहोल एक चबूतरा, जाए जोए पुल तले मिलत । रूहें ए कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥७९॥
जोए इतथें मरोर सीधी चली, अर्स आगूं सोभा सरत । रूहें क्यों छोड़ें इन कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥८०॥
दोऊ पुल के बीच में, बड़ी सातों घाटों सिफत । रूहें खेलें इत कदमों तले, जाकी असल हक निसबत ॥८१॥
नूर और नूरतजल्ला, अर्स साम सामी झलकत । ए रूहें कदम न भूलें सुपने, जाकी असल हक निसबत ॥८२॥
दोऊ दरबार की रोसनी, अंबर नूर भरत । रूहें कदम न भूलें सुपने, जाकी असल हक निसबत ॥८३॥
अर्स जिमी नूर अपार है, इतके वासी बड़े-बखत । महामत रूहें हक जात हैं, जाकी हक कदमों निसबत ॥८४॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥५२७॥
