सिनगार - प्रकरण ९ | Singaar prakaran 9
अर्स अंदर निसबत चरन
अर्स अंदर सुख देवहीं, जो रूहों दिल उपजत । सो रूहें कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥१॥
अर्स अरवाहें भोम खिलवत, नूर दसों दिस लरत । सो क्यों छोड़ें इन कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥२॥
रूहें बारे हजार बैठाए के, हक हाँसी को खेलावत । सो रूहें कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥३॥
लें सुख चेहेबच्चे भोम दूसरी, मोहोल बारे सहस्त्र जित । सो क्यों छोड़ें रूहें कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥४॥
रूहें तीसरी भोम चढ़के, बड़े झरोखों आवत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥५॥
कई इंड पलथें पैदा फना, जिन कादर ए कुदरत । ए आवें मुजरे इन सरूप के, जाकी असल हक निसबत ॥६॥
नूर मकान सें आवें दीदार को, इत नूरजमाल बिराजत । रूहें याद कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥७॥
हक बैठें पौढें भोम तीसरी, आगू झरोखों आरोगत । रूहें क्यों छोड़ें इन कदम को, जाकी असल हक निसबत ॥८॥
रूहें अर्स अजीम की, भोम चौथी देखें निरत । सो हक कदम क्यों छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥९॥
रूहें अर्स अजीम की, पांचमी भोम पौढ़त । सो सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥१०॥
रूहें अर्स अजीम की, भोम छठी कई जुगत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥११॥
रूहें अर्स भोम सातमी, जो छपर-खटों हींचत । सो सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥१२॥
ए अर्स भोम आठमी, साम सामी हिंडोलें खटकत । ए रूहें सुपने कदम न छोड़हीं, जाकी असल हक निसबत ॥१३॥
अर्स रूहें सुख नौमी भोमें, सुख सिंघासन समस्त । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥१४॥
रूहें रेहेवें अर्स में, जो सुख झरोखों भोगवत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥१५॥
हक हादी रूहें सुख अर्स चांदनी, अर्स अंबर जोत होवत । सो क्यों रहें हक कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥१६॥
सकल भोम सुख लेवहीं, रूहें हक कदम पकरत । सो क्यों रहें इन कदम बिना, जाकी असल हक निसबत ॥१७॥
आई नजीक जागनी, पीछे तो उठ बैठत । हाँसी होसी भूली पर, जाकी असल हक निसबत ॥१८॥
रूहें हुकम ले दौड़ियो, मूल तन अर्स में उठत । हक हँससी तुम ऊपर, रूहें क्यों भूली ए निसबत ॥१९॥
आया नजीक बखत मोमिनों, क्यों भूलिए हादी नसीहत । जो सुपने कदम न भूलिए, हँसिए हकसों ले निसबत ॥२०॥
लाहा लीजे दोनों ठौर का, सुनो मोमिनों कहे महामत । क्यों सुपने ए चरन छोड़िए, अपनी असल निसबत ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥५४८॥
