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आनन्द मंगल

सदा आनन्द मंगल में रहिये, सदा आनन्द मंगल में रहिये । महाप्रसाद और चरणामृत, यह सुख साथ में पइये ॥१॥

इश्क सुराही प्रेम का प्याला, अन्दर आत्म छकि रहिये । तन सोवे रूह निशदिन जागे, धाम धनी के चरणों रहिये ॥२॥

अष्ट पोहोर दिन चौंसठ घड़ियां, निशदिन पिउ पिउ पिउ कहिये । छत्रसाल भजो धाम धनी जी को, और देवन सों क्या चहिये ॥३॥

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