आरती एही है पुराण पुरुख पर | Aarti ehi hai puran purukh par
आरती एही है पुराण पुरुख पर, कर तुम निज अंग रूप प्रेम धर ॥१॥
पहली आरती करूं पुरुषोत्तम, जाको वेद गावत कर उत्तम ॥२॥
दूसरी आरती अद्दैत सुहाई, जाको निगम अगम करी गाई ॥३॥
तीसरी आरती सच्चिदानन्दा, जहां नहि मोह माया दुःख धन्दा ॥४॥
चौथी आरती अखंड अपारा, गुण निर्गुण क्षर अक्षर पारा ॥५॥
पांचमी आरती है निज सोई, जहां लीला नित्य विहार जो होई ॥६॥
आरती साजि श्री इन्द्रावती लाई, निज नवरंग परम पद पाई ॥७॥
