आरती युगल चिदानन्द केरी
आरती युगल चिदानन्द केरी, तन मन आप वारने लेरी ॥१॥
जब नहिं त्रिगुण मोह दुःख धन्दा, तबहिं अखंड सत चिद आनंदा ॥२॥
प्रेम प्रवाह जानत नहिं कोई, जग उपजे के कारण दोई ॥३॥
पहली आरती बृज में आवन, पूरन प्रेम पगे मन भावन ॥४॥
दूसरी आरती रास विलासा, अक्षर बुद्धि कीन्हों निज वासा ॥५॥
तीसरी आरती निज आवेसा, आये पति जी ने किये उपदेशा ॥६॥
चौथी आरती बुध जी श्यामा, ल्याए ज्ञान परम निजधाम ॥७॥
पांचवी आरती प्रीतम प्यारे, श्री प्राणनाथ परना पगु धारे ॥८॥
सखियां जगाय रास रच्यो मंडल, साथ सकल मिलि रमत साकुण्डल ॥९॥
जीवन मोक्ष आठ विध दीन्हीं, सैंया रतन आरती कीन्हीं ॥१०॥
