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आरती कीजे जय जय अन्त न जाको

आरती कीजे जय जय अन्त न जाको, अक्षरातीत नाम निज ताको ॥१॥

पूरन ब्रह्म सनातन सोई, जाकी इच्छा सों सब होई ॥२॥

ब्रह्म अनादि आदि नहिं जाकी, श्रुति स्मृति देत सब साखी ॥३॥

अविगति अमर अभय अविनाशी, त्रिगुन रहित बहु लोक निवासी ॥४॥

ब्रह्मा विष्णु निरंजन देवा, शिव सनकादिक लखें न भेवा ॥५॥

नारद शारद सुक मुनि शेषा, खट दरसन बहु भेख अलेखा ॥६॥

साध सिध ऋखि मुनि सब गावें, अपरम्पार पार नहिं पावें ॥७॥

सब्द रहित जो अकथ कहानी, परमहंस विरले पहचानी ॥८॥

परमहंस जो धनी पहचाने, मन वचन कर्म चित और न जाने ॥९॥

परम पुनीत परमपुर रहहीं, परमहंस जो ये सुख लहहीं ॥१०॥

सच्चिदानंद अखंड बिहारी, साथ सकल है शरण तुम्हारी ॥११॥

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