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आरती अंग चतुर्दश केरी

आरती अंग चतुर्दश केरी, पांच स्वरूप मिल एक भये री ॥१॥

रास चरण प्रकास पिंडुरिया, खटऋतु घुटन कलश जंघन की ॥२॥

सनंध कमर कर किरंतन सोहे, नाभि खुलासा उदर खिलवत की ॥३॥

हृदय तवाफ कण्ठ सागर छवि, मुख सिनगार नासिका सिंधी ॥४॥

श्रवण मारफत नयन सो कयामतनामा, चौदह अंग मिलि एक धनी के ॥५॥

श्री सुन्दर श्री इन्द्रावती जीवन, प्रेम सखी बलि बलि चरनन की ॥६॥

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