आरती सच्चिदानन्द जी की कीजे
आरती सच्चिदानन्द जी की कीजे, निज स्वरूप अपना लख लीजे ॥
मूल मिलावा मन्दिर मांहे, रतन जड़ित सिंहासन जांहे । मूल स्वरूप चरण चित्त दीजे ॥१॥
सखियां प्रेम स्वरूपा सोहें, निरख प्राण पति मन मोहें । मधुर सिन्धु अमृत रस पीजे ॥२॥
कलंगी पगड़ी पटुका जामा, लख लज्जित होय पूरन कामा । प्रेम मगन आनन्द मन भीजे ॥३॥
रतन सखी जुथ के संग आयी, प्रेम आरती साज के लाई । आरती वार पति पर रीझे ॥४॥
