अर्जी धाम चलने की
पिछला बाकी दिन, रहया घड़ी चार । धाम वतन चलन की, मोमिन करें विचार ॥
अरस की निमाज का, आए पहुंचा बखत । मोमिन अरज करत हैं, सामें होए तखत ॥
हमको इस खेल से, सिताब काढ़ो श्री राज । भए मनोरथ पूरन, रहया न कोई काज ॥
श्री धाम धनी सुनत हैं, ए वानी जो मकबूल । दुआएं जो मोमिनों की, होत हैं कबूल ॥
अर्जी सुन्दर साथ करें, चरणों में होके खड़े । पिया जी, धनी जी, खेल को बस करो, दिन बीते हैं बड़े ॥१॥
अर्श में प्रीतम से, क्यों रब्द हमने की । खेल क्यों मांग लिया, यह समझ हम में न थी । पिया जी, धनी जी, खेल को बस करो, दिन बीते हैं बड़े ॥२॥
माया भी देखी है, दुःख भी देखा है । खेल भी देख लिया, इश्क भी देखा है । पिया जी, धनी जी, ले चलो, ले चलो, दिन बीते हैं बड़े ॥३॥
आपकी जुदाई को, अंगना कैसे सहे । हैं शर्मसार हमहीं, आप से कैसे कहें । पिया जी, धनी जी, ले चलो, ले चलो, दिन बीते हैं बड़े ॥४॥
अंगना जान के ही, आपने जगाया है । ले के चलते क्यों नहीं, समझ न आया है । बल हमरा न चला, साथ चरणों में पड़े ॥५॥
