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अरजी बड़ी लिखी है

सुन्दरसाथ जी । याद कीजिए, श्री जुगल सरूप सिंहासन के ऊपर विराजमान हैं । आपन सब सखियां श्री राज जी के चरणों तले भराए के बैठी हैं । ऊपर नूर को चन्द्रवा झलकत है । फिरते फिरते चौंसठ थंभ नूर के झलकत हैं ।

तहां श्री राज जी के चरणों तले खड़े होए के अर्ज विनती कीजिए कि साहेब मेरे तुमहीं जो करी सो भई, और करत हो सो होत है, और करोगे सो होएगी । तुमारी हमकों इस्क पातसाही की खबर ना हुती । ना सुख की ना दुख की और ना मिलाप की ना जुदागी की । तुमारी हमको काहू बात की कछु खबर ना हुती । जब तुम मेहेर का दरिया दिल में लिया, तब हम सबों के दिल में उपज्या । जब तुम बरजे, तब हम फेर फेर मांगे । ज्यों तुम ज्यादा ज्यादा कह चले, त्यों हम ज्यादा ज्यादा बढ़ चलीं ।

पहले लई हकें दिल में, पीछे आई माहें नूर । ता पीछे हादी रूहन में, यों कर हुआ जहूर ॥ हकें हमारे दिल पर, यों कर किया हुकम । तब हम दिल में उपज्या, मांग्या खेल खसम ॥ हकें आप सांचे होने को, सब विध कही सुभान । आगूं ही से कह चले, जो कछू होना निदान ॥ कहया उतरते हक ने, अलस्तो बे रब कुंम । फेर कहया अरवाहों ने, वले न भूलें हम ॥

ऐ रूहों, तुम बीच नासूत के जाती हो । मैं तुमारा परवरदिगार हूं । तुम हमको कबहूं न भूलियो । ये रब्द तीसरी भोम से करके तले की भोम मूल मिलावे मांही आन बिराजे । तहां एक चरण चौकी पर लटकत है । दूसरो चरण सिंहासन के ऊपर । आपन सब सखियां श्री राज जी के चरणों तले भराए के बैठी हैं, ज्यों दाड़िम की कलियां ।

तब श्री राज जी ने प्रथम इच्छा श्री भगवान जी पर डारी । ज्यों जाग्रत में ब्रह्मांड देखते थे, त्यों स्वप्न में देखने लगे । फेर सखियों पर सुपन सरूप हुकम को आवरण डारयो । बारह हजार सखी बृज में इकट्ठी आईं । तहां ग्यारह वर्ष बावन दिन लों इस्क प्रेम में खेले ।

रास लीला खेल के आए बरारब श्याम । तहां त्रेसठ वर्ष लों, आयतें सूरतें कुरान हदीसों में लिख कर, आरबों के हाथ देकर, हैयातुल नबी ने कूच किया, याने बीच परदे के हुए ।

साल नव से नब्बे मास नव, हुए रसूल को जब । रूह अल्ला मिसल गाजियो, मोमिन उतरे तब । रूह अल्ला चौथे आसमान से उतरे, रूहअल्ला तीन दीदार देखे । प्रथम दीदार में बीच राह के पैगम्बर साहेब ने नूर को पटुका बंधायो । दूसरे दीदार में अखंड बृज देखे, श्री कृष्ण पिया संग मिले । तीसरे दीदार में बीच बेजा मुनारे के, नूर के काबे में से कलीद (कलीज) किल्ली दूसरी सूरत को दई ।

महंमद मिले ईसे मिने, तब अहमद हुआ स्याम । अहमद मिले मेहेंदी मिने, ए तीनों मिल हुए इमाम । ऐसे सखत बखत में वसीयत नामें चलाए के हमारी मदत कराई । अल्ला कलाम से साहेदी दई । वेद पुराणों से साहेदी दई । चार आसमान की पहचान कराई, पांच भांति पैदाइस की पहचान कराई । छः भांति नमाज की पहचान कराई । सातों बड़े निसान कयामत के खोल दिए । आठ भांति भिस्त की पहचान कराई । नाजी फिरका, नारी फिरका, असराफील, जबराईल, आम खलक की पहचान कराई ।

खुदा ताला ने कजा करी । मुहम्मद साहेब ने सिफायत करी । रूहें अर्स की गली गली फिरवली । असराफील ने खुस आवाज सों कुरान को गाया । फरिस्ते काम हाल छोड़ के फिरे । अर्स की किल्‍ली जाहेर भई । मोमिन मोमिन सिजदा को आवें, तो सिजदा करें । काफर मुनाफक सिजदे को आवें, तो पीठ उन्हों की सींग सी कड़ी हो रहे । चमड़ी टूटे, पर सिजदा उन्हों से न होवे ।

ताथें दोजख की आंच आई । खबरदार होए कलमा कहो । सातमें दरवाजे की आंच आई । कलमा कहो दिल में देखो । जिन दिल पर नकस नहीं, ऐसे काफरों को जलायो । ऐसे ही जलायो चाहिए । दोऊ तरफों की गीता किताबें खोल दई । तीनों सृष्ट जीव ईश्वरी ब्रह्म की पहचान कराई ।

ज्यों बिल्‍ली अपने बच्चों को लेती है, वाय मुस्क को छोड़ देती है, तैसे ही तुम हमारे लाड के पूरन करनहारे मेहेरबान । हमारे लाड पूरन कीजिए । जिन तुमारे चरणामृत प्रसाद को आसरो लियो होए, शब्द वाणी कानों से सुनी होए, या जुबान से कही होए । तिनको इन जहर जिमी से छुड़ाए के, अपने कदमों तले बैठाए कर, साख्यात दीदार दीजे । इनको नूर से पूर कीजे । सब मिल के गोदी ओढ़ के यही अर्ज विनती करत हैं ।

श्री जी साहिब जी को प्रणाम । श्री बाई जी को प्रणाम । श्री महाराजा जी को प्रणाम । श्री लालदास जी को प्रणाम । श्री समस्त सुन्दर साथ को प्रणाम । मेहेरबान महाराजाजू मोमिनों के वास्ते सब साथ मिलके अर्ज विनती कीजे । मेहेरबान महाराजाजू मोमिनों की बलाएं सब दफे कीजे, इनको नूर से पूर कीजे । यों साथ सबको बीच खिलवत के उठाए खड़े कीजे । समस्त सुन्दरसाथ को प्रणाम ।

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