अरजी छोटी लिखी है
निसदिन ग्रहिए प्रेम सों, श्री जुगल स्वरूप के चरन । निर्मल होना याही सों, और धाम बरनन ॥१॥
इन विध नरक से छूटिए, और उपाय कोई नाहें । भजन बिना सब नरक है, पचि पचि मरिए माहें ॥२॥
एक आत्म धनी पेहेचानिए, निर्मल एही उपाय । श्री महामति कहे समझ धनी को, ग्रहिए सो प्रेमें पाए ॥३॥
श्री महामति कहे महबूब जी, अब दीजे पट उड़ाए । नैना खोल के अंक भर, लीजे दुल्हा कंठ लगाए ॥४॥
गुण अवगुण जेते किए, किए जो पीछले जौन । साहेब सों सांचा रहे, साथी सांचो तौन ॥५॥
अवगुण काढ़े गुण ग्रहे, हारे से होए जीत । साहेब से सनमुख सदा, ब्रह्मसृष्टि ए रीत ॥६॥
ए सुख सब्दातीत के, क्यों कर आवें जुबान । बाले थें बुढ़ापन लग, मेरे सिर पर खड़े सुभान ॥७॥
नजर से न काढ़ी मुझे, अव्वल से आज दिन । क्यों कहूं मेहेर मेहेबूब की, जो करत ऊपर मोमिन ॥८॥
कोई देत कसाला तुमको, तुम भला चाहियो तिन । सरत धाम की न छोड़ियो, सुरत पीछे फिराओ जिन ॥९॥
श्री महामति कहे पीछा न देखिए, ना किसी की परवाह । एक धाम हिरदे में लेय के, उड़ाए दीजे अरवाह ॥१०॥
श्री महामति कहे अरवाहें अर्स से, जो कोई आई होए उतर । सो इन सरूप के चरण लेय के, चलिए अपने घर ॥११॥
हम हुकम के हाथ में, हक के हाथ हुकम । इत हमारा क्या चले, ज्यों जानें त्यों करे खसम ॥१२॥
तुम तुमारे गुण ना छोड़े, मैं करी बहुत दुष्टाई । मैं तो कर्म किए अति नीचे, पर तुम राखी मूल सगाई ॥१३॥
जानो तो राजी राखो, जानो तो दलगीर । या पाक करो हादीपना, या बैठाओ माहें तकसीर ॥१४॥
पिया जी तुम हो तैसी कीजियो, मैं अर्ज करूं मेरे पिउ जी । हम जैसी तुम जिन करो, मेरा तलफ तलफ जाए जीउ जी ॥१५॥
जीवरा तो जीवे नहीं, क्यों मिटे दिल की प्यास जी । तुम बिना मैं किनसों कहूं, तुम हो मेरी आस जी ॥१६॥
आस बिरानी तो करूं, जो कोई दूसरा होए जी । सब विध पिया जी समरथ, दिन रैन जात रोए रोए जी ॥१७॥
जन्म अंधी जो मैं हुती, सो क्यों देखूं नीके कर जी । जब तुम आप देखाओगे, तब देखूंगी नैन नजर जी ॥१८॥
ए पुकार पिया जी सुन के, ढील करो अब जिन जी । खिन खिन खबर लीजिए, मैं अर्ज करूं दुलहिन जी ॥१९॥
ऐती अर्ज मैं तो करूं, जो आड़ी भई अन्तराए जी । सो आड़ी अन्तराए टालि के, दुलहा लीजे कंठ लगाए जी ॥२०॥
कंठ लगाइए कंठ सों, पिया कीजे हांस विलास जी । वारणे जाए श्री इन्द्रावती, पिया राखो कदमों पास जी ॥२१॥
तुम दुलहा मैं दुलहिन, और न जानों बात जी । इस्क सों सेवा करूं, सब अंगों साख्यात जी ॥२२॥
सदा सुख दाता धाम धनी, मैं कहा कहूं किनसो बात जी । श्री महामति जुगल सरूप पर, अंगना बलि बलि जात जी ॥२३॥
