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तीसरी भोम का भोग

तीजी भोम की जो पड़साल, ठौर बड़े दरवाजे विसाल । धनी आवत हैं उठि प्रात, वन सींचत अमृत अघात ॥१॥

पसु पंखी का मुजरा लेवें, सुख नजरों सबों को देवें । पीछे बैठ करें सिनगार, सखियां करावें मनुहार ॥२॥

श्री स्यामा जी मन्दिर और, रंग आसमानी है वा ठौर । चार चार सखियां सिनगार करावें, स्यामा जी धनी जी के पासे आवें ॥३॥

सोभा क्‍यों कर कहूं या मुख, चित्त में लिए होत है सुख । चित्त दे दे समारत सेंथी, हेत कर कर बेनी गूंथी ॥४॥

मिनों मिने सिनगार करावें, एक दूजी को भूखन पेहेरावें । साथ सिनगार करके आवें, जैसा धनी जी के मन भावें ॥५॥

सैयां लटकतियां करें चाल, ज्यों धनी मन होत रसाल । सैयां आवत बोलें बानी, संग एक दूजी पे स्यानी ॥६॥

सैयां आवत करें झनकार, पाए भूखन भोम ठमकार । झलकतियां रे मलपतियां, रंग रस में चैन करतियां ॥७॥

कण्ठ कण्ठ में बांहों धरतियां, चित्त एक दूजी को हरतियां । सुंदरियां रे सोभतियां, एक दूजी को हांस हंसतियां ॥८॥

कई फलंग दे उछलतियां, कई फल लता जो फेरतियां । कई हलके हलके हालतियां, कई मालतियां मचकतियां ॥९॥

कई आवत हैं ठेलतियां, जुत्थ जल लेहेरां ज्यों लेवतियां । कई आवें भमरी फिरतियां, एक दूजी पर गिरतियां ॥१०॥

कई सीधियां सलकतियां, कई विध आवें जो चलतियां । सखी एक दूजी के आगे, आए आए के चरनों लागे ॥११॥

इत बड़ा मिलावा होई, जुदी रहे न या समें कोई । कोई छज्जों कोई जालिएं, कोई मोहोलों कोई मालिएं ॥१२॥

इत चार घड़ी लों श्री राज बैठें, मेवा मिठाई आरोग के उठे ॥१३॥

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