भोग- बांई आंख मेरी बेर बेर फरके
बांई आंख मेरी बेर बेर फरके, जिया हरखे मेरो भारी । अनइंछित कलियुग निकंदन, आये श्री नित्य बिहारी ॥१॥
कलश पांवड़ो ले आरती करूं, चरण पखालों ले झारी । तन मन जीव निछावर कीन्हो, पूरी है इच्छा हमारी ॥२॥
बहु पकवान मिठाई मेवा, भांति अलेखे अथाने । बनी है रसोई पिया खटरस रुचि के, थाल संजोय सखी ल्याई ॥३॥
भोग लग्यो श्री धाम धनी जी को, हाथ अबीर धुवाऊं । बैठारूं सुंदर सेज्या पर, कर कर बीड़ी आरोगाऊं ॥४॥
राखों मैं रसिक रमाय आप गृह, अनतें जान न देऊं । छत्रसाल जी के पिया जी सुंदरवर, अनेक भांति सुख देऊं ॥५॥
