भोग- प्यारी प्रेम लुभानी | Bhog- Pyari prem lubhani
प्यारी प्रेम लुभानी, पिया जी परम सुख दीजिये । सुंदर सेज्या समारूं, हेम जड़ित नंग नूर भरी ॥१॥
तापर पिया जी बैठारूं, श्री श्यामा जी संग सुहाये । आज्ञा जो मैं पाऊं, तो भोजन विविध बनाये ॥२॥
रुचि थाल सम्हारूं, मूंग जो भात फुलकियां । घृत पाक मिठाई, खुर्मा जलेबी लाडवा ॥३॥
दूध दधिया ले आई, शाक अनेक कटोरियां । लाई सकल सामग्री, आन धरे पिया पावहीं ॥४॥
पावे पिया प्यारी, जीमें सच्चिदानंद गारी, सबे सखी गावहीं । श्री जमुना जल अचवन, पान सुगन्ध विशेषिये ॥५॥
लाडबाई की सेज्या, आज राज इतहीं रहें । चापों चरण पिया के, कर सों बिजन डोलाइये ॥६॥
गुहि गुहि हार फूलन के, सो पिया को पहेराइये । हंसि बोले हैं प्रीतम, नैन सों सैन मिलाइये ॥७॥
उनको सुख दीजे, और सबे सुख लीजिये । सुख सेज्या बखानों, अक्षर ब्रह्म जाने नहीं ॥८॥
ब्रह्मा विष्णु महेशा, नारद शारद इतहीं रहे । माया उरझाने, सुर नर मुनि जेते भये ॥९॥
काहू प्रेम न जान्यो, बसत गोपियन के हिये । सद्गुरु इत आये, श्री तारतम लिये हाथ म ॥१०॥
खोलि पार लखाये, ब्रह्मसृष्टि के कारणे । जागे सोई पावे, मुकन्द सखी सुख पाइया ॥११॥
