बीड़ी लिखी है
आरोग्या रस रूप युगल धनी, बीड़ी तो सुंदर लीधी । कर सिनगार सिंहासन ऊपर, सिनगार आरती कीधी ॥१॥
चहूं ओर रूहें मिल गावें, श्री राज ना मन मोहे । आज हमारे घेर आनन्द उच्छव, दीप दिवाली सोहे ॥२॥
आज रंगनी रेल वही, मारो वालो जी मन्दिर वसिया रे । श्री इन्द्रावती पति रूप युगल पिया, नवरंग ना पिउ रसिया रे ॥३॥
