चन्दन चढ़ावनी | Chandan chadavni
चलो सखी श्री सुन्दरवर जी ने निरखिये, श्री श्यामा जी ने जोई जोई मन हरखिये । श्री श्यामा जी ना अंग हो सुन्दर साथ, निरखि हरखि उमंग न मात ॥१॥
सुन्दर साथ बैठो घेरि घेरि, परिकरमा तो दीजे फेरि फेरि । दीपक रंग रे सिंहासन, छत्रि तो डांडे झालर सोभा अति घन ॥२॥
तापर कंचन कलस जो होई, झलहल जोत करे रहे सोई । ये रे सिंहासन जोत न मावे, सखियां तो सनमुख वाणी गावे ॥३॥
श्री मंडल नवरंग बाई जी के हाथ, बेन बाई बेन बजावे तिन साथ । झरमर बाई झरमरियां जो बजावे, तान बाई ताननियां जो मिलावे ॥४॥
सेन बाई स्वर पुरावे तिन संग, मन में तो धरे उछरंग । ये उछरंग कहयो न जावे, सखियां तो प्रेम सहित वाणी गावें ॥५॥
श्री चन्दन पुष्प बहु बिध राजे, सुगंध सर्व मारा वाला जी ने छाजे । श्री पिया जी ना पूजन इन विध कीजे, फेर फेर मूल स्वरूप चित में लीजे ॥६॥
जो कोई वासना इन घर, मूल स्वरूप से न काढ़े नजर । नहीं कोई सुख इन समान, अंगना तो कोटि बेर कुरबान ॥७॥
