दाहिनी तरफ का मन्दिर
दाहिनी तरफ दूजा जो मन्दिर, आए बैठे ताके अन्दर ॥१॥
नीला ने पीला रंग, ताकी उठत कई तरंग । दोऊ रंगों की उठत झांई, इन मन्दिरों दिवालों के तांई ॥२॥
पैठते दाहिने हाथ जांही, सेज्या है या मन्दिर मांही । कई जिनस जड़ाव सिंहासन, राज स्यामा जी के दोऊ आसन ॥३॥
झरोखे को पीठ देवें, बैठे द्वार सनमुख लेवें । संग सखियां केतिक विराजें, या समें श्री मंडल बाजे ॥४॥
नवरंग बाई जो बजावें, मुख बानी रसीली गावें । इत बाजत बेन रसाल, बेनबाई गावे गुन लाल ॥५॥
सखी एक निकसे एक पैठे, एक आवे उठे एक बैठे । इन समें भगवान जी इत, दरसन को आवें नित ॥६॥
झरोखे सामी नजर करें, परनाम करके पीछे फिरें । इत और न दूजा कोए, स्वरूप एक है लीला दोए ॥७॥
भगवान जी खेलत बाल चरित्र, आप अपनी इच्छा सों प्रकृत । कोट ब्रह्मांड नजरों में आवें, खिन में देख के पल में उड़ावें ॥८॥
और ए तो लीला किसोर, सैयां सुख लेवें अति जोर । ए लीला सुख केता कहूं, याको पार परमान न लहूं ॥९॥
इत खेलत जुत्थ सैयन, सदा आनन्द इन वतन । मिने राज स्यामा जी दोय, सुख याहि आतम सब कोय ॥१०॥
रस प्रेम सरूप है चित, कई विध रंग खेलत । बुध जाग्रत ले जगावती, सुख मूल वतन देखावती ॥११॥
प्रेम सागर पूर चलावती, संग सैयों को भी पिलावती । पिया जी कहें इंद्रावती, तेज तारतम जोत करावती ॥१२॥
तासों महामत प्रेम ले तौलती, तिनसों धाम दरवाजा खोलती । सैयां जाने धाम में पैठियां, ए तो घर ही में जाग बैठियां ॥१३॥
