गरबा | Garbaa
चलो चलो रे सखियों आज, परना देखि आई । जहां आये हैं श्री राज, सखियां उठि धाई ॥१॥
गुंमट बंगला बन्यो धनी को, हीरन तखत जड़ाय । युगल स्वरूप रूप अति सुन्दर, सोभा वरनी न जाय ॥२॥
विष की नदिया अमृत कीन्ही, और रतन की खान रे । धन धन है तिन छत्रसाल को, जिन कीन्ही बुध पहचान रे ॥३॥
नेहेरें चलें इल्म की निसदिन, झीलत सखियां आप । अरस परस उछरंग अंग में, हंस हंस करत मिलाप ॥४॥
भविष्य पुरान बुध कहि भाखत, चित्रकूट अस्थान । ज्ञान सखी तिन चरण में, तन मन धन कुरबान ॥५॥
