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गौरी- समझि बूझि गुरु कीजे

समझि बूझि गुरु कीजे, साधो भाई, समझि बूझि गुरु कीजे । यह तो सौदा परम अमोलक, निरखि परखि के लीजे ॥१॥

ज्ञान गम्भीर शील सन्तोषी, प्रेम अमृत मुख भाषे । अति निर्मल निजनाम सुनावे, जन्म मरण से राखे ॥२॥

धीरजवन्त धर्म प्रतिपालक, वेद लै भेद बतावे । आप तरे सिष्यन को तारे, बहुरि न भव जल आवे ॥३॥

खीर नीर को करे निवेरा, माया ब्रह्म चिन्हावे । जीव को आदि अंत बतलावे, अलख वस्तु लखावे ॥४॥

दूजी साखी कबीर की देवे, विध विध वाणी सुनावे । करके अर्थ बूझि जब देखो, तब संशय मिट जावे ॥५॥

यह तो बात प्रगट है साधो, शिव सुक मुनि श्रुति गाई । बिना सद्गुरु कोई पार न पावे, कोटि करे चतुराई ॥६॥

जो कोई खोज करे सद्गुरु की, सब्दै में लखि पावे । बिना विवेक वृथा पचि मरना, भरम में रैण दिन धावे ॥७॥

ता कारण यह सार सब्द पद, कहत मुकुन्द विचारी । हंसा होए सो सुन के बूझे, माने वचन हमारी ॥८॥

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