गौरी- कृष्ण नहीं अवतारी | Gauri- Krishn nahin avtaari
कृष्ण नहीं अवतारी, साधो भाई, कृष्ण नहीं अवतारी । पूर्ण ब्रह्म सनातन दोय भुज, कहत है निगम पुकारी ॥१॥
वेद पुराण शास्त्र सब भाखे, साधु सकल संसारी । पांच तत्व गुण तीन लोक तें, है मथुरा निज न्यारी ॥२॥
लोक चतुरदश हैं परलेवस, आदि अंत ओंकारी । तब कहां कृष्ण कहां निज मथुरा, देखो मनहिं विचारी ॥३॥
गोपी कृष्ण अनादि एक हैं, जल तरंग ज्यों वारी । कारण मूल रच्यो एक कारज, आय भई ब्रज नारी ॥४॥
तिन गोपिन की पद रज इंछित, ब्रह्मा विष्णु त्रिपुरारी । करि करि कोटि तपस्या बहु विध, त्रिगुण थके पचिहारी ॥५॥
दश अवतार राजा होय बरते, विष्णु माया अनुसारी । राम आदि अवतार होत हैं, सो वैकुण्ठ विहारी ॥६॥
जाय द्वारका में राज कियो है, ब्याही सोले सहस्त्र कुमारी । सो संपूर्ण वैकुण्ठ के ठाकुर, संख चक्र गदा धारी ॥७॥
वेद ऋचा तलफत ब्रज छोड़ी, विरहा दाह में जारी । कृष्ण द्वारका काहे न बुलाई, गोकुल गोप कुमारी ॥८॥
लीला त्रिविध भई नाना विध, बाल तरुण वृद्ध वारी । कहत मुकुन्द सद्गुरु समरथ बिन, कोई ना सके निरवारी ॥९॥
