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गौरी- जाऊं कहां महाराज शरण तजि

जाऊं कहां महाराज शरण तजि, जाऊं कहां महाराज । अनते ठौर नहीं कोई हमको, चरण छोड़ि श्री राज ॥१॥

जो जो आये धनी शरण तुम्हारी, तिनके किये सब काज । शरणे मरणे सुन्यो नहिं कबहूं, बड़े हो गरीब निवाज ॥२॥

पावन पतित निगम यश गावत, श्रवण सुनत आवाज । जो अघ पतित मिटे न मेरो, वृद्ध को आवत लाज ॥३॥

विनती करत मुकुन्द दीन द्विज, सब पतितन सिरताज । अंगना जानि पिया पार उतारो, लेहु चढ़ाय जहाज ॥४॥

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