गौरी- प्राणनाथ मन भाये
प्राणनाथ मन भाये, आली मोहि, प्राणनाथ मन भाये । विंध्याचल पर्वत के ऊपर, सुन्दर धाम सुहाये ॥१॥
गुम्मट बंगला बन्यो है धनी को, हीरन तखत धराये । रत्न जड़ित पद्मावती सोहे, देव सकल ललचाये ॥२॥
विख की नदिया अमृत कीन्हों, सुख सबन पहोंचाये । भजन किरंतन होत रात दिन, सुनत मोक्ष फल पाये ॥३॥
श्री ठकुराणी जी साथ सकल मिलि, जागनी रास खेलाये । श्री सुंदर श्री इन्द्रावती जीवन, अमर सखि चंवर ढोलाये ॥४॥
