गौरी- मन तुम चलियो निज दरबारा | Gauri- Mann tum chaliyo nij darbara
मन तुम चलियो निज दरबारा । पांच तत्व वैकुण्ठ सुन्यतें, गुन निर्गुन से न्यारा ॥१॥
ओंकार और काल निरंजन, ज्योति सरूप तें न्यारा । सबलिक ब्रह्म अव्याकृत केवल, अक्षरहूं से पारा ॥२॥
परमधाम दस खंड विराजे, सोभा रतन पहारा । सात घाट जमुना जी के दोऊ पुल, आगे अक्षर नूर द्वारा ॥३॥
चांदनी चौक चबूतरा चारों, लाल वृक्ष हरियारा । सौ सिढ़ियां चढ़ि ऊपर जइये, थंभ अठाईस न्यारा ॥४॥
चारों हार हवेली होय के, चौंसठ थंभ निहारा । तले गिलम ऊपर चन्द्रवा, सोहे चारों द्वारा ॥५॥
कंचन रंग जड़ित सिंहासन, तहां पर युगल विहारा । चारों खांचों में लाल जो तकिये, बैठे बारे हजारा ॥६॥
झलहल ज्योति करे सिंहासन, सोभा बहुत अपारा । अमर सखी सेवा में हाजिर, पावे नित्य दीदारा ॥७॥
