गौरी- छत्रसाल जी ने बाना बांधे
छत्रसाल जी ने बाना बांधे, निजनाम शरण को आये । चौदे लोक में आन चलाये, ऐसा द्वन्द मचाये ॥१॥
पंडित वेद पुराण पढ़ैया, तिनहुं के डिंभक भाने । कोई दिन चली है काजी की बाजी, फेर हुकम तले आये ॥२॥
देवी और देवता छोड़े, छोड़ी है कुल की आस । कीन्हों एक संग साधुन को, जिनको श्री धाम में वास ॥३॥
एते दिन माया भर्माया, ठीक लगन नहिं पाया । सखी साकुण्डल के पिया प्रगटे, श्री धाम धनी लौ लाया ॥४॥
