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दोपहर के बाद सखियां वन में खेलने जाती हैं | Dopahar ke baad sakhiyan vann mein khelne jati hain

सैयां बैठी जुदे जुदे टोले, करें रेहेस बातें दिल खोलें ॥१॥

तित कई विध रस उपजावें, कई विलास मंगल मिल गावें । कई हंस हंस ताली देवें, यों कई विध आनन्द लेवें ॥२॥

कई बैठत छज्जों जाए, बैठें अंग सों अंग मिलाए । मुख बानी सों हेत उपजावें, एक दूजी को प्रेम बढ़ावें ॥३॥

रस अनेक बातन लेवें सुख, सो मैं कहयो ना जाए या मुख । सरूप सोभा जो सुन्दरता, बस्तर भूखन तेज जोत धरता ॥४॥

कई बैठत मिलावे आए, बैठे अंग सों अंग लगाए । सुख एक दूजी को उपजावें, मुख बानी सों प्रीत बढ़ावें ॥५॥

हांस विनोद ऐसा करें, सुख प्रेम अधिक अंग धरें । यों सुख मिनों मिने लेवें, सखी एक दूजी को देवें ॥६॥

कई बैठत जाए हिंडोले, अनेक करत कलोलें । कई बैठत जाए पलंगे, बातां करत मिनों मिने रंगे ॥७॥

यों अनेक विधे सुख नित, पिया जी को सदा उपजत ॥८॥

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