मंगल आरती
सुख को निधान जय जय सुख को निधान, मंगल आरती सुख को निधान । उठि बैठे सुख सेज्या श्री राज, संग अर्धांग अली लिये लाज ॥१॥
रैनि जगे जगमग दोऊ नैना, बोलत बोल मधुर मुख बैना । निरखि निरखि हरखें ब्रह्मसृष्टि, जुगल पिया जी सों जोड़े दृष्टि ॥२॥
उठि बैठे दोऊ सेज्या सुखदाई, आरती साजि श्री इन्द्रावती ल्याई । आरती वारती सखियां सर्व अंग, लेत वारणे निज नवरंग ॥३॥
