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नृत्य (कृष्ण पक्ष)

निरत होत चौथी भोम में, जित मोहोल बन्यो विसाल । चौक मध्य अति सुन्दर, क्यों कहूं मन्दिर द्वार ॥१॥

तीनों तरफों मन्दिर, आगूं दो दो थंभों की हार । बड़ा मोहोल अति सोभित, सुन्दर अति सुखकार ॥२॥

थंभ द्वार अति सोभित, तरफ तीनों साठ मन्दिर । बीस बीस हर तरफों, चौक बैठक अति अन्दर ॥३॥

द्वार सोभित कमाड़ियों, साठों करें झलकार । और जोत थंभन की, सुख कहूं जो होए सुमार ॥४॥

पीठ पीछे जो मन्दिर, कई रंग सेत दिवाल । दाहिनी तरफ लाखी मन्दिर, क्यों कहूं नकस मिसाल ॥५॥

बांई तरफ दिवाल जो, मन्दिर लिबोई रंग । बेल नकस कटाव कई, सो केते कहूं तरंग ॥६॥

हरी दिवाल जो मन्दिर, सो सामी है नेक दूर । चारों तरफों अर्स जवेर, करे जंग नूर सों नूर ॥७॥

एह ठौर है निरत की, सो केता कहूं मजकर । चारों तरफों ऊपर तले, कहूं मावत नहीं जहूर ॥८॥

राज स्यामा जी बीच में, बैठक सिंहासन । रूहें बारे हजार को, हक देत सुख सबन ॥९॥

कई विध के बाजे बजें, नवरंग बाई नाचत । हाथ पांऊ अंग बालत, कही न जाए सिफत ॥१०॥

ले बाजे रूहें खड़ी, मृदंग जंत्र ताल । रंग रबाब चंग तंबूरा, बोलत बेन रसाल ॥११॥

पांऊ झांझर घूंघर बोलहीं, कांबी कड़लो बाजत । याही तरह अनवट बिछुआ, संग लिए गाजत ॥१२॥

हाथ कंकन नंग नवघरी, स्वर एकै रस पूरत । और भूखन सबों अंगों, सोभित सब सूरत ॥१३॥

जिन विध पांऊ चलावहीं, सोई भूखन बोलत । जो बजावें झांझरी, तो घूंघरी कोई ना चलत ॥१४॥

जो बोलावत घूंघरी, तो नहीं झांझरी बान । जो सबे बोलावत, तो बोलें सब समान ॥१५॥

प्रेम रसायन गावत, अति प्यारी मीठी बान । याही विध हस्त देखावहीं, फेर फेर देत हैं तान ॥१६॥

कई जुदे जुदे बोलें भूखन, सब बाजे मिलावत संग । एक रस सब गावत, नवरंग बाई के रंग ॥१७॥

हाथ धरत मृदंग पर, जब अव्वल स्वर करत । निरत करें कई विध सों, कई गुन कला ठेकत ॥१८॥

कई गत भांत रंग ल्यावत, ए तो कामिल निरत कमाल । इन छेक बालन की क्यों कहूं, जो देखत नूरजमाल ॥१९॥

कई विध कहूं बाजंत्र की, कई विध नट नाचत । कई विध की फेरी कहूं, कई रंग रस गावत ॥२०॥

नामै जाको नवरंग, ताकी निरत कहूं क्यों कर । अनेक गुन रंग ल्यावहीं, नए नए दिल धर ॥२१॥

मुरली बजावत मोरबाई, बेनबाई बाजंत्र । तानबाई तान मिलावत, निरत जामत इन पर ॥२२॥

कंठ केलबाई अलापत, स्वर पूरत बाईसेंन । सब मिल गावें एक रस, मुख बानी मीठी बैन ॥२३॥

झरमरबाई बजावत, माहें झरमरी अमृती । कई बाजे कई रंग रस, ए रंग अलेखे कहूं केती ॥२४॥

खड़ियां रूहें निरत में, इत उछरंग होत । तरफ चारों जवेरन में, निरत देखें अधिक जोत ॥२५॥

निरत कला सब नाच के, फेर फेर देत पड़ताल । यों स्वर मीठे मोहोलन के, चलत आगूं मिसाल ॥२६॥

ऐसे ही प्रतिबिंब इनके, मोहोल बोलें कई और । बानी बाजे निरत अवाजे, होत निरत कई ठौर ॥२७॥

साम सामी पसु पंखी नंग के, जंग करें जवेरों दोए । एक ठौर निरत नाचत, ठौर ठौर सामी होए ॥२८॥

यों सब ठौर जंग अर्स में, कहूं केती विध किन । अपार अखाड़े सब दिसों, होत सब में रोसन ॥२९॥

ए रूह की आंखों देखिए, असल बका के तन । तो देखो चित्रामन धाम की, करत निरत सबन ॥३०॥

एह खेल एक पोहोर लग, होत हमेसां इत । पंद्रा दिन जब घर रहें, तब देखें दुलहा निरत ॥३१॥

मेहेबूब को रिझावने, अनेक कला साधत । और नजर ना कर सकें, बंध ऐसे ही बांधत ॥३२॥

थंभ दिवालें सिंहासन, सब में होत निरत । इन समें पसु पंखी चित्रामन के, सब ठौरों केलि करत ॥३३॥

बोहोत बातें बीच अर्स के, किन विध कहूं इन मुख । जो बैठीं इन मेले मिने, सोई जानें ए सुख ॥३४॥

ऐसी चारों तरफों कई बैठकें, अन्दर या गिरदवाए । ए सुख अखंड अर्स के, क्यों कर कहे जांए ॥३५॥

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