परिक्रमा- पूर्ण ब्रह्म सच्चिदानन्द रूप
पूर्ण ब्रह्म सच्चिदानन्द रूप, संग श्यामा जी सोहे अनूप ॥१॥
चारों चरन सुन्दर सुखदाई, भूखन की सोभा मुख वरनी न जाई ॥२॥
झांझरी घुंघरी कांबी कड़ला अलेखे, अनवट विछुवा श्री श्यामा जी विसेखे ॥३॥
नीलो है चरणिया केसरी इजार, श्वेत दावन झांई करे झलकार ॥४॥
चोली स्याम जड़ाव साड़ी सेंदुरिया रंग राजे, हैयड़े पर हार सोभा अधिक विराजे ॥५॥
जरी जामा श्वेत जड़ाव अंग सोहे, नीलो पीलो पटुका देखत मन मोहे ॥६॥
जामे ऊपर चादर रंग आसमानी, छेड किनार बेली जाय न बखानी ॥७॥
जरी पाग सेंदुरिया जगमग जोत, राखड़ी कलंगी कही जाय न उद्योत ॥८॥
शब्दातीत पिया शोभा है अपार, श्री महामति अंगना जाय बलिहार ॥९॥
