पौढ़ावनी- पौढ़ो श्री राज अवार भई है
पौढ़ो श्री राज अवार भई है । सेज समारी दोय पलंग की, आधी ऊपर रैन गई है ॥१॥
श्री जी हेत सों वचन सुनावत, धाम स्वाद में रूह रही है । साथ श्रवण महाराज सुनत हैं, सबकी रूह मगन भई है ॥२॥
अर्ज करत मुस्काये लाडली, पिया हैरत लखि बात लई है । उठि पिया चाल चलत रंग भीने, सबहिं समाज को सीख दई है ॥३॥
पिया धरत पग सेज सुरंगी, सब सखियन को बात कही है । अपने अपने मंदिर पधारो, भोम पांचमी रतनमयी है ॥४॥
बंगले श्री राज हिंडोले पौढ़त, धन उन भाग जो सेवा में रही है । कृष्ण सखी नित्य चरण सोहरावत, दिन दिन बाढ़त प्रीति नई है ॥५॥
