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पौढ़ावनी- हेली सेजड़ी रे बिछाई | Paudavni- Heli sejdi re bichhai

हेली सेजड़ी रे बिछाई, मिल आशावन्ती जुत्थ आई ।

कुसुम अनंत सो रची है सेजड़ी, तापर पिया अलसाई ॥१॥

नैन की सैन किए नागर दोऊ, रुचि रुचि सेज बिछाई ॥२॥

निरतत नवल प्रेम रस भीने, पिया निरखे ललचाई ॥३॥

मोहन रसिक उठे रस रीते, दम्पति दोऊ लपटाई ॥४॥

श्री सुन्दर श्री जीवन पौढ़े, नवरंग रसिक गुण गाई ॥५॥

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