प्रभाती- उठि प्रभात निरखिये
उठि प्रभात निरखिये, मुख श्री प्राणनाथ प्यारे ॥टेक॥
सुन्दर विसाल नैन, बोलत अति मधुरे बैन । चितवत मन मोहि लेत, मोहिनी सी डारे ॥१॥
कोमल अति अंग विसाल, हाथ पांव कटि रसाल । अंबुज मुख निरखि दृगन, तन मन धन वारे ॥२॥
मुसकत छवि लसन दसन, सोहत अंग तड़ित वसन । कलंगी सिर गोस पेच, वरनत कवि हारे ॥३॥
बृज और रमाये रास, जागनी को करि प्रकास । वय किसोर निरखि जुगल, ज्ञान सखी धारे ॥४॥
