प्रभाती- जागिये श्री प्राणनाथ
जागिये श्री प्राणनाथ, प्रातः भयो प्यारे ॥टेक॥
पूर्व दिस उदय अरुण, सखियां सब ठाड़ी सरण । पंखी उड़ि चले चरन, जागिये दुलारे ॥१॥
बैठे उठि नाथ सेज, अंग रंग सकल तेज । झलकत छवि रेजा रेज, भूखण संभारे ॥२॥
गौर लखि मुखारविंद, विहंसत आनन्द कन्द । बोलत स्वर मंद मंद, नेत्र तेज तारे ॥३॥
सोहत भुजा बाजू बंध, कंठहार सर प्रबंध । वस्त्र छवि तड़ित मंद, अंग संग सारे ॥४॥
गावत जेहि अगम निगम, पावत नहिं सुर नर गम । आये धरि देह सुगम, चौदे भुवन तारे ॥५॥
ज्ञान सखी निरखि बदन, लाजत छवि कोटि मदन । आये सोई नंद सदन, चरणन बलिहारे ॥६॥
