दोपहर का राज भोग
सखियां केतिक बन में जावें, साक पान मेवा सब ल्यावें । घड़ी चार खेल तित करें, दिन पोहोर चढ़ते आवें घरें ॥१॥
ए सब इच्छा सों मंगावें, पर सखियों को सेवा भावे । सैंया सेवा करन बेल ल्यावें, लेवें एक दूजी पे छिनावें ॥२॥
निकसते दाहिनी तरफ जो ठौर, सैयां आए बैठें चढ़ते दिन पोहोर । मिलावा होत दिवालों के आगे, सैयां पान बीड़ी वालने लागे ॥३॥
मसाला समार समार के लेवें, सखी एक दूजी को देवें । डेढ़ पोहोर चढ़ते दिन, बीड़ी वाली सैयां सबन ॥४॥
बीड़ियों की छाब लेकर, धरी पलंग तले चौकी पर । श्री राज बैठे बातां करें, श्री स्यामा जी चित्त धरें ॥५॥
सैयां परस्पर करें हांस, लेवें धनी जी को विविध विलास । घड़ी दो एक तापर भई, लाडबाई आए यों कही ॥६॥
श्री धनी जी की अग्या पाऊं, तो या समें रसोई ले आऊं । श्री धनी जी ने अग्या करी, सैयां चौकी आन आगे धरी ॥७॥
सैयां दोए चाकले ल्याई, सो तो दोनों दिए बिछाई । श्री राज उतारे वस्तर, पेहेनी पिछौरी कमर पर ॥८॥
श्री राज चाकले आए, श्री स्यामा जी संग सोहाए । श्री राज पखाले हाथ, श्री स्यामा जी भी साथ ॥९॥
सैंया दौड़ दौड़ के जावें, आरोगने की वस्तां ल्यावें । मेवा अंन ने साक मिठाई, कई विध सामग्री ले आईं ॥१०॥
एक ले चली साक कटोरी, तापे छीन ले चली दूसरी । तिनथें झोंट ले चली तीसरी, चौथी वापे भी ले दौरी ॥११॥
जो कदी छीन लेत हैं जिनपे, पर रोस न काहूं किनपे । इत थें जो फिर कर गैयां, तिन और कटोरी जाए लैयां ॥१२॥
यों एक एक पे लेवें, हेत एक दूजी को देवें । सब मन्दिर करें झनकार, स्वर उठत मधुर मनुहार ॥१३॥
सैयां दौड़त हैं साम सामी, सब्द रहयो सबों ठौर जामी । कई स्वर उठत भूखन, पड़छंदे परें स्वर तिन ॥१४॥
कई बिध उठत मीठी बानी, मुख बरनी न जाए बखानी । इन समें की जो आवाज, सोभा धाम में रही विराज ॥१५॥
दूध दधी ल्याई लाडबाई, सो तो लिए मन के भाई । सब खेलें हांसी करें, आए आए धनी जी के आगे धरें ॥१६॥
या समें दौड़त भूखन बाजे, पड़छंदे भोम सब गाजे । झारी लेके चल्लू कराई, मुख हाथ रुमाल सों पोंछाई ॥१७॥
श्री स्यामा जी चल्लू करी, दोए बीड़ी दो मुख में धरी । श्री राज उठ बैठे सिंहासन, संग स्यामा जी उठे ततखिन ॥१८॥
दोए आसन जोड़े आए, सैयां चौकी चाकले उठाए । सैयां तले आरोगन गैयां, आरोग आए पान बीड़ी लैयां ॥१९॥
सेज्या आए श्री जुगल किसोर, तब दिन हुआ दो पोहोर ॥२०॥
सिनगार करें देहलान में, आरोगें और मन्दिर । इतही दीदार नूर को, दिन पौढ़ें पलंग अन्दर ॥२१॥
