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सद्गुरु वन्दना सायंकाल | Sadguru vandanaa saayankaal

वन्दौ सद्गुरु चरण को, करूं प्रेम प्रणाम । अशुभ हरन मंगल करन, श्री देवचन्द्र जी नाम ॥१॥

श्री देवचन्द्र जी को दरश दियो, जो हैं पूरन रूप । तारतम को तत्व कहयो, हिरदे बैठि स्वरूप ॥२॥

धाम धनी अखंड हैं, पावन पूरन नाम । पद के परे परम पद, सो कहिये परनाम ॥३॥

गुरु कंचन गुरु पारस, गुरु चंदन परमान । तुम सद्गुरु दीपक भये, कियो जो आप समान ॥४॥

तुम स्वरूप, तुम में स्वरूप, तुम स्वरूप के संग । भेद तुम्हारो को लखे, ब्रह्मनन्द रस रंग ॥५॥

तुम खेवट भानु वह देश के, देहु चक्षु आप समान । दृष्टि तुम्हारी क्‍यों रहे, संशय तिमर अज्ञान ॥६॥

जो पद नारायण भजे, ब्रह्मा विष्णु महेश । महाविष्णु वांछित सदा, मोहे पहुंचाओ वा देश ॥७॥

काल करम भव दु:ख से, तुमहीं छुड़ावन हार । परमहंस पद देत हो, क्षर अक्षर के पार ॥८॥

क्षर अक्षर के पार है, अक्षरातीत आधार । बिन संबंध न पाईये, कोटिन करे आचार ॥९॥

वेद थके ब्रह्मा थके, थकि गये शेष महेश । गीता को जहां गम नहीं, वह सद्गुरु को देश ॥१०॥

सद्गुरु मेरे स्याम जी, मैं अहनिस चरणें रहूं । सनमंध मेरा याही सों, मैं ताथें सदा सुख लहूं ॥११॥

श्री प्राणनाथ निज मूल पति, श्री मेहेराज सुनाम । तेज कुंवरि श्यामा जुगल, पल पल करूं परनाम ॥१२॥

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