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संध्या स्मरण

संझा सुमरन आरती, भजन भरोसे दास । मनसा वाचा कर्मणा, श्री युगल चरण की आस ॥१॥

श्वास श्वास निजनाम जपो, वृथा श्वास मत खोय । ना जानो इन श्वास को, आवन होय न होय ॥२॥

झण्डा गाड़यो प्रेम को, चहुं दिस पिउ पिउ होय । ना जाने इस झुण्ड में, कौन सुहागिन होय ॥३॥

सुकव्यास कहे भागवत में, प्रेम न त्रिगुन पास । प्रेम बसे ब्रह्मसृष्टि में, जो खेले स्वरूप ब्रज रास ॥४॥

नवधा से न्यारो कहयो, चौदह भुवन में नाहिं । सो प्रेम कहां से पाइये, जो वसत गोपियन माहिं ॥५॥

प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न चीन्हें कोय । आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥६॥

प्रेम छिपाये ना छिपे, जो घट प्रगट होय । जो के मुख बोले नहीं, नयन देत हैं रोय ॥८॥

आया है सो जायेगा, राजा रंक फकीर । कोई सिंहासन चढ़ि चले, कोई बांधे जात जंजीर ॥९॥

ये तो गति है अटपटी, झटपट लखे न कोय । जो मन की खटपट मिटे, चटपट दरसन होय ॥१०॥

प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय । बिना प्रेम को मानवा, बांधे यमपुर जाय ॥११॥

क्या मुख ले विनती करूं, लाज आवत है मोहि । तुम देखत अवगुण किये, ये कैसे भाऊं तोहि ॥१२॥

मैं अपराधी जन्म का, नख सिख भरा विकार । तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो संभार ॥१३॥

मो में गुण कछू है नहीं, तुम गुण भरे हो झाझ । गुण अवगुण न विचारिये, बांह गहे की लाज ॥१४॥

अवगुण किये तो बहु किये, कर्त्तव्य मती निहार । भांवे बंदा बकसिये, भांवे गर्दन मार ॥१५॥

अछरातीत के मोहोल में, प्रेम इस्क बरतत । सो सुध अछर को नहीं, किन विध केलि करत ॥ १६॥

तन दीपक मन ज्योति करूं, प्रेम घृत लौ लाय । सोभा लखि श्री राज की, आरती करूं चित्त लाय ॥१७॥

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