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प्रातःकाल का सरूप

श्री राज श्री ठकुराणी जी, प्रथम भोम में विराजमान भये, तहां कंचन रंग को सिंहासन, तिनके छह पाए छह डांडे । एक एक डांडे में दस दस रंग जवेरों के झलकत हैं । दो छत्री दो स्वरूपों के ऊपर, दो फूल लाल मानिक के कमल के, नीलवी की पांखड़ी, छत्री के चारों तरफों जवेरों की झालर । छह डांडों पर छह कलस, दो कलस दोऊ छत्रियों के ऊपर, ये आठों कलस हेम के । उतरती कांगरी, पशमी बिछौना, एक गादी, दोय चाकले, पांच तकिये ।

श्री राज श्री ठकुराणी जी, दो चाकले पर विराजमान भये । कै चाकले चित्रकारी, तापर बैठे श्री युगल बिहारी । दोऊ स्वरूप चित्त में लीजे, फेर फेर आत्मा को दीजे । आत्मा से न्‍यारे न कीजे अधखिन, फेर फेर कीजे दर्शन । पहले अंगुरी नख चरन, मस्तक लों कीजे वर्णन । सब अंग वस्तर भूखन, शोभा जाने आत्मा की लगन ।

सुन्दर श्री ठकुराणी जी को सिनगार- सेंदुरिया रंग जड़ाव की साड़ी, स्याम रंग जड़ाव की कंचुकी, नीली लाहि को चरणिया । श्री राज जी को सिनगार- सेंदुरिया रंग जड़ाव को चीरा, आसमानी रंग जड़ाव की पिछौरी, नीलो न पीलो बीच के रंग को पटुका, केसरिया रंग जड़ाव की इजार, स्वेत रंग जड़ाव को जामा । श्री युगल स्वरूप को मूल वागो, अद्वैत की लाठी हाथ में ले के, सब साथ को प्रणाम ॥

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