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श्री जी साहेब जी को स्वरूप

श्री जी साहेब जी को स्वरूप, अपने चित्त के विखे लीजिये, सुन्दर जा स्वरूप सों, आपन हमेशा रमे खेले, श्री मुख की चर्चा वचन वानी याद कीजिए ।

श्री जी साहेब जी प्रात: काल के समय सुन्दर सुख सेज्या से पौढ़े से उठे, उठि तखत पर विराजमान भये । श्री बाई जी साहेब जी, श्री जी साहेब जी के चरणों लाग के, जोड़े गादी पर विराजमान भई । श्री महाराजा जी, श्री लाल दास जी, साथ सब स्वरूपदे, पुरुषदे श्री जी साहेब जी के चरणों लाग लाग के, आप अपनी सेवा में तत्पर आए आए खड़े रहे । श्री जी साहेब जी साथ सबको वचन द्वारा होय अमृत सींचत हैं । मेहरबानगी कर वचन फुरमावत हैं ।

श्री जी साहेब जी को मुखारविन्द, अत्यन्त गौर गेहेरी लालक लिये । केश चोये में भिगोये, जरी को गोटा रोसन, सुन्दर बादले को चीरा, केसरिया रंग गोस पेच, मुर्ग पेच, जड़ाव की कनढप्पी ऊपर फूलों की कलंगी, तुरा चन्द्रकारी, हीरों की दुगदुगी, यह हमेशा छवि छाजत है । तिलक रंग कंचन, मध्य दो रेखा बिन्दका लाल । केश तिलक निलवट पर, दो रेखा चली लग कान, केश ना घट बढ़, सोभा चाहिये जैसी सुभान ।

श्री जी साहेब जी के दोऊ भौहें स्यामता लिये नेत्र तारे तेजवान, फिरते अनियारे चातुरी, मान भरे चंचल, अन्दर स्याह सुपेती लिये, मध्य रेखा लाल । श्री जी साहेब जी के दोऊ कर्ण कोमल में, चारू मोती दानासरी, अष्टधातु के बाला, चार चार करड़े मोतियों की लटकनी, भरे गलस्थल, दोऊ गालों की झांई, गौर निर्मल नासिका, अत्यन्त शोभायमान मुखारविन्द की शोभा, मुख में बीड़ी लाल तम्बोल की, दन्त जानो दाड़िम की कलियां । या मुखारविन्द की शोभा पर, जीव को कुरबान कर डारिये ।

श्री जी साहेब जी के दोऊ लाल अधुरों की शोभा, सुन्दर लांक गौर हरवटी, कण्ठ में कण्ठी तुलसी की विराजमान । छाती कसादी पेट पांसे, तेज की अम्बार भरी कमर, खुले अंग देखिये । श्री जी साहेब जी को सुपेत नीमा, चोली अंग को लग रही, घेरदार दावन चीन की शोभा । दोऊ बगलों गुलाब की, चोवा की खुसबोय, दरसाले की कबाय, दुसाला थुर्मा, सुपेत रंग कबाय पे जुड़ बैठो ।

श्री जी साहेब जी के दोऊ खम्भे मच्छे, कोनी कलाई कांड़े । दोऊ हथेलियां, बहुत नरम कोमल उज्जवल पतली मिहीन रेखा, दसों अंगुरियां दोऊ हस्त कमल की, तापर नख रोशन, सुन्दर हीरों से विराजमान । दसों अंगुरियों में दस बीटी । एक बीटी हीरा की, लसनियां, गोमादिक, मोती, पन्ना, परवाल, पुखराज, नीलवी, दोऊ अंगुठों में दो अंगुष्ठाने । रत्न चौक की दोहरी पोहोंची । सातों नगों की सात सात दुगदुगी, ताकि एक पोहोंची । सात नगों की एक दुगदुगी, ताकि दूसरी पोहोंची । एक एक जड़ाव के कड़े । जामे की बांह की मोहोरी पर फिरते मोती, करली छोटी न मोटी जाड़ी न पतली सबे बनी एक रस । कोहनियों के ऊपर बाजूबन्ध जड़ाव के ।

कण्ठ में कण्ठी सुवर्ण की, मध्य चौपहलु मादलीया । दूसरी कण्ठी मोतिन की मध्य चौपहलु मानिक, तले मोती लटकत हैं । तीसरी कण्ठी पानड़ी की, ताकी तीनों दुगदुगी, एक दुगदुगी हीरा की, एक मानिक की, एक नीलवी की । दूसरी बड़े मोतिन की माला, चन्द्रहार उतरती तरह जिनकी जनेऊ की पहेरी है । यह श्री जी साहेब जी के उर ऊपर हार विराजमान । पटका कमर में कस्या है, पटका के पल्‍लों पर जवेरों के बूटा, इजार रंग केसरी नारो नवरंग स्याम स्वेत, लाखी, लिंबोई, जांबूजरदोरिया, कसूंमर केसरी कसुंबी जालीदार, आगे दोऊ नरम झाबे झलकत हैं । पीड़ी अत्यन्त गौर पायचा झीणी करली झणवार, इजार की मोहोरी पर फिरते मोती ।

चारों जोड़े चरन कमल के भूखण, चरण कमल बहुत नरम कोमल, उज्जवल लालक लिये, रंग रस भरे कदम । पाणी लांक लाल एड़ियां गृदवाय फिरते कांगरी चरण तली दोऊ चरण कमल की बहुत नरम कोमल उज्जवल पतली महीन रेखा । दसों अंगुरियां, दोऊ चरण कमल की, तापर नख रोशन, सुंदर हीरों से विराजमान, ये मेहेर करें चरण जिन पर, देत हृदय पूर्ण स्वरूप, जुगल किसोर चित चुभत सुख सुंदर रूप अनूप ।

श्री जी साहेब जी नख सिख लों सिनगार साजि के, तखत पर विराजमान भये । ये बीच कुरान हदीसों के, चेहरा लिखा है । सिर पर बालों की चोटी, गेहुंआ रंग, स्याह आंखें, यही खलकत हैं । साहेदी खुदा की, खुदाय देवे, करे बयान हुकम सिर लेवे । लायक पूजने के यही खुदाय पाक बरहक है । खुसबोय को रूमाल श्री जी साहेब जी के दोऊ हस्त कमल में राखिए । इन चरणों बेर बेर लागिये । सो ये चरण कैसे हैं कि सुखदाई हैं ।

श्री बाई जी साहेब जी अपने मंदिर में से, नख सिख लों सिनगार साजि के, मेवा मिठाई को थाल भराय के, आरती को सरंजाम लेवाय के, आप सुखपाल में विराजमान होय आईं । श्री जी साहेब जी के चरणों लाग के जोड़े गादी पर विराजमान भई । श्री महाराजा जी, श्री लाल दास जी, साथ सब चरणों लाग लाग भराय के बैठे ।

श्री बाई जी साहेब जी ने श्री जी साहेब जी के दोऊ चरण धुवाय के और दोऊ हस्त कमल धुवाय के चुल्लू कराये । मुख हाथ रूमाल सों पुछाय के मेवा मिठाई आरोगावने लगीं । भांति भांति के पकवान, भांति भांति की तरकारियां, अनेक भांति के बहु व्यंजन, मूंग भात घृत दूध भात, खांड, दधि, सिखरण सहित श्री जी साहेब जी अति रुचि सों आरोगत जात हैं । श्री बाई जी साहेब जी अति प्रीति सों परोसते जात हैं । श्री जी साहेब जी आरोगत हैं । अधबीच में मंद मंद मुसकनी छवि सों, बातें करते करते ऐसे घड़ी दो एक में, श्री जी साहेब जी आरोग रहे । श्री बाई जी साहेब जी ने, श्री जी साहेब जी को जल अचवाय चुल्लू कराय के, मुख हाथ रूमाल सों पुछाये । केसर, कपूर, कस्तूरी, लवंग, इलायची, जावित्री संयुक्त पानों की बीड़ी आरोगाय के, तिलक दे चांवर चौड़े । ऊपर फूलों की बरखा करी ।

वस्तर भूखन पहेराय के श्री बाई जी साहेब जी ने आरती करी । श्री महाराजा जी ने मोरछल करी । श्री लालदास जी ने चंवर करी । श्री जी साहेब जी ने पानों के बीड़ा बख्शे । श्री बाई जी साहेब जी ने प्रसाद लियो । श्री महाराजा जी ने प्रसाद लियो । श्री लाल दास जी ने प्रसाद लियो और सब साथ को प्रसाद पोहोंच्यो । श्री जी साहेब जी सर्व साथ को श्री राज श्री ठकुराणी जी को मूल सरूप तथा श्री निजधाम को वर्णन समस्त साथ के हृदय में भरावत हैं ।

श्री निजधाम नव भोम दसमी आकासी । श्री जमुना जी के सातों घाट । पाट को घाट, जांबू को घाट, नारंगी को घाट, बट पीपल की चौकी, बट को घाट, बट को पुल, कुंज वन की रेती । जमुना जी के किनारे एक मोहोल एक चबूतरा, जमुना जी दोऊ तरफ ढंपी, बीच में खुली । सोलह देहुरी को घाट, तेरह देहुरी को घाट, झुण्ड को घाट, नव देहुरी को घाट, आठ थंभ, पाल की मोहोलात । टापू की मोहोलात, चौबीस हांस की मोहोलात, जवेरों की नहरें ।

मानिक पहाड़ की मोहोलात, मानिक पहाड़ के हिंडोले । बन की नहरें, चार हार हवेली, रांग की मोहोलात । नूर सागर, नीर सागर, खीर सागर, दघि सागर, घृत सागर, मधु सागर, रस सागर, सर्वरस सागर । पश्चिम की चौगान, दूब दुलीचा, अन्न बन, फूल बाग, नूर बाग, लाल चबूतरा, खड़ोकली, ताड़वन, ताड़वन के हिंडोले । बड़ोवन, मधुवन, महावन, पुखराज की तरहटी में बाग बगीचे और मोहोलात ।

पुखराज को चबूतरा, पुखराज की हजार हांस की चांदनी, चांदनी पर मोहोलात । पुखराज के प्रथम थंभ की मोहोलात । पुखराज के दूसरे थंभ की मोहोलात । पुखराज के तीसरे थंभ की मोहोलात । पुखराज के चौथे थंभ की मोहोलात । पुखराज के पांचवे पेड़ की मोहोलात । पुखराज के पश्चिम तरफ की घाटी । पुखराज के उत्तर तरफ की घाटी । पुखराजी पहाड़ में बंगलों की मोहोलात । आकासी मोहोल, आकासी की चांदनी, चांदनी पर एक सौ आठ गुरजन की मोहोलात । पुखराजी ताल । पुखराजी ताल के धाम के तरफ की मोहोलात । पुखराजी ताल के उत्तर तरफ की मोहोलात । पुखराजी ताल के दोऊ गुरजन के बीच की देहेलान । अधबीच को कुण्ड । खास मोहोल, जहां से सोलह चादरें गिरती हैं ।

ढपो चबूतरा, मूल कुण्ड, जहां से श्री जमुना जी प्रगटी । ढपी जमुना जी । जमुना जी दोऊ तरफ पटी । आगे अधबीच में श्री जमुना जी खुली जहां से जमुना जी मरोर खाई, वहां से एक मोहोल और एक चबूतरा केल के पुल ताईं । केल को पुल, केल को घाट, लिंबोई को घाट, अनार को घाट, पाट को घाट ।

यहां आय अमृत वन दरसाय के श्री निजधाम दरवाजे के सनमुख चांदनी चौक में खड़े होय के । अन्दर मूल मिलावे की खिलवत और मोहोल मंदिर गली गली कूचा कूचा समूह सब साथ के हिरदे में भरावत हैं । आठों पोहोर की लीला । हलवन, चलवन, पोहोर-पोहोर घड़ी-घड़ी साइत-साइत की लीला, याद कीजिए । प्रात: काल से संझा लों और संझा से प्रात: काल लों । साथ सब को हमेशा नूर बरसावत हैं ।

सो सुखदाई स्वरूप को याद करके । सब साथ मिल के अर्ज विनती कीजिए कि मेहेरबान । तुमही फुरमान लाये, कुंजी भी तुमही लाये । तुमही साहेब इमाम खुदा काजी होय बैठे हो । साथ पर मेहेर करो मेहेरबान या जंगल दरियाव अंधेरी में छोड़के, साथ सों अन्तराय करि के बैठे हो । सो ये मोमिन गरीब, अतीम, फकीर, तुम्हारे चरण कमल जानत हैं । ताथें सब साथ की सुरता खैंच के, अपने कदम दिखाओ । सब साथ मिल के यही अर्ज विनती करत हैं । हे श्री जी साहेब जी । सब साथ को बीच खिलवत के उठाय खड़े कीजिये । इनको नूर से पूर कीजिए । समस्त सुन्दर साथ को प्रणाम ।

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