मध्य रात्रि का स्वरूप (शुक्ल पक्ष) | Madhya ratree ka swaroop (shukl paksh)
श्री राज श्री ठकुराणी जी, तीसरी भोम के नीले पीले मंदिर से पौढ़े से उठे तखत पर विराजमान भये । पोहोर दिन पीछला बाकी रहयो । आपन सब सखियां आये आये के, कोई बट पीपल की चौकी से, कोई फूलबाग से, कोई नूरबाग से, कोई लाल चबूतरा से, कोई खड़ोकली से, कोई ताड़वन से, कोई ताड़वन के हिंडोले से, कोई बड़ेवन से, कोई मधुवन से, कोई महावन से, कोई पुखराज से, कोई पुखराज की तरहटी से, कोई बंगलों से, कोई श्री जमुना जी के सातों घाटों से, कोई कुंजवन से, कोई कुंजवन की रेती से, कोई हौजकोसर तालाब से, कोई हौजकोसर के टापू से, कोई पश्चिम की चौगान से, कोई श्री निजधाम नव भोम दसमी आकासी से, बारे हजार चालीस जुत्थ सब सखियां आये आये के, श्री राज श्री ठकुराणी जी के चरणों लागीं ।
छठी भोम के सुन्दर सुखपाल, तरह जिनकी तखतरवा की, इच्छा स्वरूपी नूर के सुन्दर सुखपाल, तीसरी भोम के झरोखों में आये मुकाबिल भये । एक सुखपाल में श्री राज श्री ठकुराणी जी विराजमान भये । एक एक सुखपाल में दो दो सखियां, जोड़े जोड़े अन्तरिक्ष इच्छाचारी, मनवेगी नूर के सुन्दर सुखपाल, श्री अक्षरातीत की आसमान में सवारी छाये रही । कोई सुखपाल श्री राज श्री ठकुराणी जी के दाहिनी तरफ, कोई सुखपाल श्री राज श्री ठकुराणी जी के बांई तरफ, कोई आगे, कोई पीछे, चारों तरफों नूर के सुन्दर सुखपाल चले जाते हैं ।
कई हजारों लाखों करोड़ों खूब खुसाली खेल खिलौने खेल करते चले जाते हैं । कई हजारों लाखों करोड़ों वानर बाजे बजावते, नगारे निसान लिये चले जाते हैं । कई हजारों लाखों करोड़ों जमीन के पशु पंखी जमीन पर, आसमान के पशु पंखी आसमान पर, कोई राज राज करते, कोई धनी धनी करते, धनी के गुण गावते, रिझावते, छड़ी फिरावते, हुकम जमावते चले जाते हैं । अक्षरातीत की तमाम सवारी आसमान में भराय रही । आज श्री राज श्री ठकुराणी जी साथ समस्त को ले के जहां इच्छा हुई तहां पधारे । तहां छः घड़ी लों साथ रमे खेले, बाकी दो घड़ी दिन रहयो । एक घड़ी में झीलना किये, एक घड़ी में सिनगार ।
सुन्दर श्री ठकुराणी जी को सिनगार- सेंदुरिया रंग जड़ाव की साड़ी, श्याम रंग जड़ाव की कंचुकी, नीली लाहे को चरणिया । सुन्दर श्री राज जी को सिनगार- सेंदुरिया रंग जड़ाव को चीरा, आसमानी रंग जड़ाव की पिछौरी, नीलो न पीलो बीच के रंग को पटुका, केसरिया रंग जड़ाव को इजार, सुपेत रंग जड़ाव को जामा ।
श्री युगल स्वरूप साथ सब नख सिख लों सिनगार साजि के, पोहोर रात्रि लों वन में रमे खेले रामतें करी । तहां नाना प्रकार के मेवा मिठाई आरोग के, श्री जमुना जल चुल्लू कर, पानों के बीड़ी लिये । सुन्दर सुखपाल में विराजमान भये । सुखपाल श्री निजधाम की तरफ को चलाये ।खूबी वन की खूबी देखते दिखलावते, आसमान की खूबी तमाशा देखते दिखलावते, सुखपाल आय आय के पांचमी भोम के झरोखों में उतारे । सुखपालों को आज्ञा दई, छठी भोम के देहेलान में पधारे । पशु पंखियों को आज्ञा दई, बड़े बन के विखे पधारे । खूब खुसालियन को आज्ञा दई, बंगलों के विखे पधारे ।
आप श्री युगल स्वरूप साथ समस्त को ले के पांचवी भोम मध्य परवाली रंग मंदिर में पधारे । तहां सुन्दर नूर की चौकी पर चारों चरण धर के सुंदर सुख सेज्या पर विराजमान होय पौढ़े । आपन सब सखियां आये आये के श्री राज श्री ठकुराणी जी के चरणों लाग लाग के श्री राज श्री ठकुराणी जी को स्वरूप हिरदे में ले के, सखियां सब आप अपने मंदिरों पधारीं । श्री राज जी सब मंदिरों में पधारे । होत सेज्या नित विहारे । यह स्वरूप चित के विषे राखिये, इन चरणों बेर बेर लागिये ॥
