सिनगार आरती- आरती करूं रे
आरती करूं रे, श्री प्राण जीवन अति घन, प्रकाश पूरन ॥ सुन्दर वरनी आरती ॥१॥
धन धन धनी श्री देवचन्द्र जी, श्री श्यामा जी अवतार । जेणे आवी आ निध प्रकट करी, अंग श्री इन्द्रावती विस्तार ॥ सुन्दर वरनी आरती ॥२॥
उज्जवल थाल श्री बुध जी स्वरूप, मध्य दीपक तारतम जोत । आवेस लई ने आरती करूं, जेणे थाय साथ ने रुदे उद्योत ॥ सुन्दर वरनी आरती ॥३॥
रास रसिक अति सुन्दर, जीरे पूरण पुंज प्रकास । कलस सनंधनी वाणी लई ने, तिमर कीधां सर्वे नास ॥ सुन्दर वरनी आरती ॥४॥
निरखो जुगल स्वरूप सुन्दर, साजि सिनगार सर्वे अंग । जेणे निरखि अति सुख पाइये, होय हिरदे अति रे उछरंग ॥ सुन्दर वरनी आरती ॥५॥
श्री जी ये सुख प्रगट करया, निजधाम तणा आवार । जीरे बार हजार नी चरण रेणु पर, अंगना जाय बलिहार ॥ सुन्दर वरनी आरती ॥६॥
