चौथे पहर का उठापन
सब सैयां पोहोर पीछल, टोलें तीसरी भोम आवें चल ॥१॥
मन्दिर आइयां सैयां जब, खुले द्वार दरसन पाए सब । तब आए सबे सुखपाल, स्यामा जी बैठे संग लाल ॥२॥
दोए दोए सैयां सब संग, मिल बैठ करें कई रंग । सुखपाल चलावें मन, ज्यों चाहिए जैसा जिन ॥३॥
या जमुना जी या तलावे, आए खेलें जो मन भावे । श्री राज स्यामा जी के डेरे, सुखपाल उतारे सब नेरे ॥४॥
जुत्थ जुदे जुदे बन खेलें, खेल नए नए रंग रेलें । तब लग खेलें साथ सब, दिन घड़ी दोए पीछला जब ॥५॥
सैयां मिलकर पिउ पासे आवें, झीलने की बात चलावें । श्री राज स्यामा जी उठकर, उतारे हैं वस्तर ॥६॥
पेहेने वस्तर जो झीलन, राज स्यामा जी सैंया सबन । इत एक घड़ी लों झीलें, जल क्रीड़ा कई रंग खेलें ॥७॥
बाकी दिन रहयो घड़ी एक, तामें सिनगार किए विवेक ॥८॥
