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राग वसन्त

ऐसो वसंत खेलो मारी सजनी, आवागमन मिट जाय । उलटन नहीं दे अमलनी भारी, व्यापक वस्तु देखावे ॥१॥

घणां ने गुलाल उड़ावो, मारी सजनी प्रेम भरी पिचकारी । अविनासी संगे होरी खेलो, कबहूं न हैये हारी ॥२॥

वस्तु रूपे व्यापक विश्वमां, समुंदर दरियो भरीयो । सतगुरु सांचा जेने मलिया, तेणे ये वर वरीयो ॥३॥

वेद सर्वे ने सत बतावे, पंडित कांइये न जाणे । सखी आनन्द ये निर्भय थई ने, प्रेम तणो रस माणे ॥४॥

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