विरह के प्रकरण
राग सिंधुड़ा
वालो विरह रस भीनों रंग विरहमां रमाड़तो, वासना रूदन करे जल धार । आप ओलखावी अलगो थयो अमथी, जे कोई हुती तामसियों सिरदार ॥१॥
कलकली कामनी वदन विलखाविया, विश्वमां वरतियो हा हा कार । उदमाद अटपटा अंग थी टालीने, माननी सहुए मनावियो हार ॥२॥
पतिव्रता पल अंग थाए नहीं अलगियो, न कांई जारवंतियो विना जार । पात्रियो पिउ थकी अमें जे अभागणियों, रहियो अंग दाग लगावन हार ॥३॥
स्या रे एवा करम करया हता कामनी, धाम मांहें धणी आगल आधार । हवे काढ़ो मोह जल थी बूडती कर ग्रही, कहे महामती मारा भरतार ॥४॥
॥ किरन्तन प्रकरण ॥३५॥
हांरे वाला रल झलावियो रामतें रोवरावियो, जुजवे पर्वतों पाड़या रे पुकार । रणवगडा मांहें रोई कहे कामनी, धणी विना धिक धिक आ रे आकार ॥१॥
वेदना विखम रस लीधां अमें विरहतणां, हवे दीन थई कहूं वारंवार । सुपनमां दुख सहया घणां रासमां, जागतां दुख न सेहेवाए लगार ॥२॥
दंत तरणां लई तारूणी तलफियो, तमें बाहो दाहो दीन दातार । खमाए नहीं कठण एवी कसनी, राखो चरण तले सरण साधार ॥३॥
हवे हारया हारया हूं कहूं वार केटली, राखो रोतियो करो निरमल नार । कहे महामती मेहेबूब मारा धणी, आ रे अर्ज रखे हाँसीमां उतार ॥४॥
॥ किरन्तन प्रकरण ॥३६॥
हांरे वाला बंध पड़या बल हरया तारे फंदड़े, बंध विना जाए बांधियो हार । हंसिए रोइए पड़िए पछताइए, पण छूटे नहीं जे लागी लार कतार ॥१॥
जेहेर चढ़यो हाथ पांउं झटकतियो, सरवा अंग साले कोई सके न उतार । समरथ सुखथाय साथने ततखिण, गुणवंता गारूडी जेहेर तेहेने तेणी विधें झार ॥२॥
मांहें धखे दावानल दसो दिसा, हवे बलण वासनाओं थी निवार । हुकम मोहथी नजर करो निरमल, मूल मुखदाखी विरह अंग थी विसार ॥३॥
छल मोटे अमने अति छेतरया, थया हैया झांझरा न सेहेवाए मार । कहे महामती मारा धणी धामना, राखो रोतियों सुख देयो ने करार ॥४॥
॥ किरन्तन प्रकरण ॥३७॥
केम रे झंपाए अंग ए रे झालाओ, वली वली वाध्यो विख विस्तार । जीव सिर जुलम कीधो फरी-फरी, हठियो हरामी अंग इंद्री विकार ॥१॥
झांप झालाओ हवे उठतियो अंगथी, सुख सीतल अंग अंगना ने ठार । बाल्या वली वली ए मन ए कबुधें, कमसील काम कां कराव्या करतार ॥२॥
गुण पख इंद्री वस करी अबलीस ने, अंगना अंग थाप्यो दई धिकार । अर्थ उपले एम केहेवाइयो वासना, फरी एणे वचने दीधी फिटकार ॥३॥
मांहेले माएने जोपे ज्यारे जोइए, त्यारे दीधी तारूणी तन तछकार । कलकली महामती कहे हो कंथजी, एवा स्या रे दोष अंगनाओं ना आधार ॥४॥
॥ किरन्तन प्रकरण ॥३८॥
हांरे वाला कांरे आप्या दुख अमने अनघटतां, ब्राध लगाडी विध विध ना विकार । विमुख कीधां रस दई विरह अवला, साथ सनमुख मांहें थया रे धिकार ॥१॥
अनेक रामत बीजी हती अति घणी, सुपने अग्राह ठेले संसार । उघड़ी आंख दिन उगते एणे छले, जागतां जनम रूडा खोया आवार ॥२॥
सनमुख तमसूं विरह रस तम तणो, कां न कीधां जाली बाली अंगार । त्राहि त्राहि ए वातों थासे घेर साथमां, सेहेसूं केम दाग जे लाग्या आकार ॥३॥
विरह थी विछोडी दुख दीधां विसमां, अहनिस निस्वासा अंग उठे कटकार । दुख भंजन सहु विध पिउ जी समरथ, कहे महामती सुख देंण सिणगार ॥४॥
॥ किरन्तन प्रकरण ॥३९॥
हांरे वाला अगिन उठे अंग ए रे अमारड़े, विमुख विप्रीत कमर कसी हथियार । स्वाद चढ्या स्वाम द्रोही संग्रामें, विकट बंका कीधा अमें आसाधार ॥१॥
कुकरम कसाब जुध कई करावियां, पलीत अबलीस अम मांहें बेसार । जागतां दिन कई देखतां अमने छेतरया, खरा ने खराब ए खलक खुआर ॥२॥
ओलखी तमने अमें जुध कीधां तमसूं, मन चित बुध मोह ग्रही अहंकार । ए विमुख वातों मोटे मेले वंचासे, मलसे जुथ जहां बारे हजार ॥३॥
कहे महामती हूं गांऊं मोहोरे थई, पण विमुख विधो वीती सहु मांहें नर नार । धाम मांहें धणी अमें ऊंचूं केम जोईसूं, पोहोंचसे पवाड़ा परआतम मोंझार ॥४॥
॥ किरन्तन प्रकरण ॥४०॥
