Kuljam.org

विषय-सूची

परमहंस चमेल सिंह | Chamel Sinh

परमहंस श्री राम रतन महाराज ने मुजाहिदपुर में रहकर भी ध्यान-साधना की है । एक बार मुजाहिदपुर में उनसे सत्संग करने राणधना गांव के कुछ लोग आए, जिनमें चमेल सिंह भी थे ।

श्री चमेल सिंह आर्य समाज से जुड़े हुए थे । श्री राम रतन महाराज से भेंट करके वे उनकी अलौकिक आभा से प्रभावित हुए । जब महाराज जी ने उन्हें परब्रह्म के विषय में सरल शब्दों में समझाया, तो उन्होंने उस ज्ञान को निष्पक्षता से ग्रहण व स्वीकार किया । जब वे पूरी तरह सन्तुष्ट हो गए, तब उन्होंने महाराज जी से तारतम ग्रहण कर लिया ।

महाराज श्री राम रतन की संगति में रहकर श्री चमेल सिंह परमधाम का चितवन करने लगे । वे अवसर मिलने पर महाराज जी से मिलने भी जाया करते थे । उनके कुछ रिश्तेदार उन्हें महाराज जी से मिलने से मना करते थे, परन्तु सत्य ग्रहण करने के बाद उन्होंने किसी की नहीं सुनी । जिसके अन्दर परमधाम की आत्मा विराजमान हो, वह किसी के रोके रुक नहीं सकती ।

ऐसी किंवदन्ती है कि गांव के कुछ लोगों ने उन्हें रोकने के लिए एक तान्त्रिक से सम्पर्क किया । उस तान्त्रिक ने अपने प्रेतों को श्री चमेल सिंह के पीछे लगा दिया, परन्तु वे सब विफल होकर लौट आए । उन्होंने बताया कि चमेल सिंह को रोकना उनके बस में नहीं है । जिस गुरु के पास वे जाते हैं, उनका तेज तो परमात्मा के समान है, जिसे सहन करने का सामर्थ्य उनमें नहीं है ।

धीरे-धीरे श्री चमेल सिंह की आत्मा श्री राज और परमधाम का दर्शन पाने के लिए इतनी व्याकुल हो गई कि वे अपने घर पर रात-दिन चितवन में लीन रहने लगे । महाराज जी की कृपा व उनकी तड़प के फलस्वरूप सन् 1956 में उन्हें श्री राज व परमधाम का साक्षात्कार प्राप्त हुआ ।

साक्षात्कार के बाद जब वे महाराज जी से मिलने आए, तो उन्होंने महाराज जी को दण्डवत् प्रणाम किया । इसके पश्चात् विनम्रता की मूर्ति महाराज जी ने परमहंस श्री चमेल सिंह को प्रणाम किया । फिर दोनों बहुत प्रेम से गले मिले । परमधाम की दो आत्माओं का ऐसा सुन्दर मिलन दुर्लभ देखने को मिलता है ।

श्री राम रतन महाराज ने श्री चमेल सिंह से श्री कुलजम सरूप के ज्ञान का प्रचार व जागनी कार्य करने का आग्रह किया, परन्तु उनका मन चितवन में इतना रम चुका था कि इसमें उनकी कोई रुचि नहीं थी ।

ऐसी मान्यता है कि साक्षात्कार के बाद परमहंस श्री चमेल सिंह अधिक समय तक नहीं रहे और उनकी आत्मा शरीर त्यागकर श्री प्राणनाथ के चरणों में समर्पित हो गई ।

Share on WhatsApp