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परमहंस गोपाल मणि | Gopal Mani

जन्म एवं प्रारम्भिक शिक्षा

गोपाल मणि जी का जन्म विक्रम सम्वत् 1616 (सन् 1559) में मधुबनी (बिहार) के एक ग्राम में हुआ था । उनकी माता का नाम सुलक्षणा और पिता का नाम वेद मणि था । वे अपने माता-पिता के तीसरे पुत्र थे ।

जब गोपाल मणि की आयु छह माह थी, तब एक टोना करने वाली औरत ने उन पर ऐसा टोना किया कि उनकी धड़कन रुक गई । परिवार ने उन्हें मृत समझ कर मिट्टी के नीचे दबा दिया । तब उस औरत ने उन्हें मिट्टी से निकालकर सिद्ध मन्त्रों द्वारा जीवित कर लिया । वह उन्हें लेकर जाने ही वाली थी कि एक महात्मा ने सब कुछ जानकर उसका संहार किया और बालक को दीर्घ आयु का आशीर्वाद देकर परिवार को सौंप दिया । माता-पिता बहुत हर्षित हुए ।

आठ वर्ष की आयु में माता-पिता ने गोपाल मणि जी को कुछ दूर स्थित कलावती पुर ग्राम में गुरु विद्याधर के पास विद्या अध्ययन के लिए भेज दिया । वहां उन्होंने बहुत उमंग और लग्न के साथ अध्ययन किया ।

सोलह वर्ष की आयु में गोपाल मणि जी कुछ दिनों के लिए घर आए थे । तब एक साधु के कहने पर वे काशी में विद्या अध्ययन करने के लिए उद्यत हुए और बिना घर में किसी को बताए महात्माओं की एक टोली के साथ चल पड़े । वह टोली पहले अयोध्या गई, जहां सबने राम मन्दिर में दर्शन किए ।

घर में माता-पिता गोपाल मणि के लिए बहुत चिन्तित हो रहे थे । बालक को ढूंढते हुए पिता उसके गुरुकुल पहुंच गए और उसके गुरु विद्याधर से भेंट की । गुरु ने बालक की जन्मपत्री देखकर उनके पिता को सान्त्वना दिया कि वह पूर्व-जन्म के योगी पुरुष हैं और वैराग्य के कारण चले गए हैं, उनकी कोई चिन्ता न करें ।

अयोध्या से आगे चलते हुए गोपाल मणि जी साधुओं के साथ प्रयागराज पहुंचे । उस समय तक उनकी आयु अठारह वर्ष हो चुकी थी । प्रयागराज में उन्होंने गंगा में स्नान किया । प्रयाग में एक मास रहने के पश्चात् उन्होंने काशी के लिए प्रस्थान किया ।

काशी में गोपाल मणि जी ने भगवान शिव के मन्दिर में दर्शन किया, तद्पश्चात् असी घाट पर बैठकर विद्या अध्ययन का विचार करने लगे । काशी में दो वर्ष रहकर उन्होंने सभी वेद, शास्त्र, उपनिषदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया ।

परमात्मा की खोज व देशाटन

बीस वर्ष की आयु में गोपाल मणि जी जगन्नाथ पुरी के दर्शन के लिए निकल पड़े । चित्रकूट, रीवा, अमरकंटक, आदि स्थानों पर विचरण करते हुए वे पुरी पहुंचे । मन्दिर में दर्शन करने के पश्चात् समुद्र तट पर भी गए । उन्हें जहां भी साधु-महात्मा दिख जाते, वे उनसे सत्संग करके ब्रह्मज्ञान पाने का प्रयास करते, परन्तु अभी तक सभी जगह निराशा मिली ।

ब्रह्मज्ञान की खोज में गोपाल मणि जी अलग-अलग तीर्थों व साधु-महात्माओं के पास विचरण कर रहे थे । 23 वर्ष की आयु में वे रामेश्वर पुरी पहुंचे । वे ईश्वर, जीव और माया के गूढ़ रहस्यों को समझने की जिज्ञासा से साधु-सन्तों की शरण में तथा आश्रमों में जाते रहे ।

दक्षिण से चलकर गोपाल मणि जी पश्चिमी तट पर नासिक, पंचवटी, नर्मदा, आदि देखते हुए द्वारिका पुरी पहुंचे । द्वारिका में उन्होंने एक वर्ष तक निवास किया । उस समय उनकी आयु 31 वर्ष थी । वहां से वे मथुरा गए और वृन्दावन, गोकुल, गोवर्धन, नन्द ग्राम, यमुना, आदि का दर्शन किया । वहां भी वे एक वर्ष रहे ।

मथुरा से चलकर गोपाल मणि जी हरिद्वार गए, जहां कुम्भ मेला लगा था । कुम्भ में अनेक सन्तों और महात्माओं से ज्ञान चर्चा सुनी, परन्तु मन को सन्तोष या तृप्ति नहीं हुई ।

विक्रम सम्वत् 1651 में गोपाल मणि जी हिमालय की यात्रा पर चल पड़े । केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, नील गिरी, कैलाश, आदि का दर्शन किया । तद्पश्चात् वे एक सघन वन में चले गए, जहां सुन्दर पुष्प-लताएं थीं ।

उस वन में एक छोटी सी कुटी में महायोगी त्रिशंकनाथ ध्यान-साधना में लीन थे । गोपाल मणि जी ने उन्हें प्रणाम किया । महायोगी ने दृष्टि खोली, उनकी तरफ देखा और उनका परिचय पूछा । तब गोपाल मणि जी ने बताया कि किस प्रकार वे अनेक वर्षों से परमात्मा की खोज में भटक रहे हैं, परन्तु कोई भी वेद-शास्त्रों के अनुकूल ब्रह्म की वास्तविक पहचान बता नहीं पा रहा है । उन्होंने महायोगी से विनती की कि वे कृपा करके उन्हें आत्म-दर्शन का मार्ग दिखाएं ।

योग साधना व दर्शन

विक्रम सम्वत् 1653 में महायोगी त्रिशंकनाथ ने गोपाल मणि को जिज्ञासु व योग्य जानकर अष्टांग योग की विधि बताई । गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने तीन वर्ष तक योग-साधना की, जिसके फलस्वरूप उन्हें अष्ट सिद्धियां प्राप्त हो गईं । अब वे पल भर में जहां इच्छा चाहे वहां जा सकते थे तथा कोई भी रूप धारण कर सकते थे । सब सिद्धियां पाने के बाद उन्होंने गुरु चरणों में प्रणाम किया । गुरु ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि आज से तुम्हारा नाम महायोगी गोपाल नाथ हुआ ।

इसके पश्चात् गोपाल मणि जी के मन में इच्छा हुई कि विदेश की यात्रा करनी चाहिए । गुरु से आज्ञा लेकर वे जम्बू द्वीप के अन्य खण्डों पर विचरण के लिए निकल पड़े । कभी मनुष्य, तो कभी भंवरे का रूप धारण करके वे एशिया व यूरोप के अनेक देशों में पर्वत, वन, नदी, सरोवर, समुद्र तट, नगर, ग्राम, आदि के दृश्यों को देखने लगे । जहां कहीं उन्हें कोई सुन्दर स्थान दिखता, तो वे ध्यान में बैठ जाते । एक बार जब वे समाधि में बैठते, तो कई वर्ष बाद ही उठा करते थे । इस प्रकार उन्होंने तीन बार सभी खण्डों में भ्रमण कर लिया, परन्तु मन को शान्ति नहीं मिली ।

इस समय विक्रम सम्वत् 1832 चल रहा था और गोपाल मणि जी की आयु 216 वर्ष हो चुकी थी । अब वे हिमालय के एक रमणीक स्थान पर बैठ कर सोचने लगे कि परम तत्व को प्राप्त किए बिना शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती । इसी विचार के साथ वे पुनः ब्रह्म ज्ञान की खोज में निकल पड़े ।

खोज करते-करते गोपाल मणि जी को निम्बार्क सम्प्रदाय के एक महात्मा मिले, जिनका नाम प्रकाश दास था । महात्मा जी ने उन्हे कहा कि श्री कृष्ण की भक्ति के बिना जीवन का उद्धार नहीं हो सकता और जीव को शान्ति भी नहीं मिलती । महात्मा जी ने उन्हे चूड़ामणि मन्त्र प्रदान किया और प्रेममयी भक्ति करने का सिखापन दिया । उस समय गोपाल मणि जी की आयु 226 वर्ष हो चुकी थी ।

महात्मा जी से ज्ञान पाकर गोपाल मणि जी एकान्त स्थान पर ध्यान में लीन हो गए । समाधि की अवस्था में बारह वर्ष बीत गए । इस साधना में उन्होंने अपना तन, मन, जीव परब्रह्म के स्वरूप पर अर्पण कर दिया । जब उनकी आंखें खुलीं, तो सामने तेज मण्डल में एक दिव्य स्वरूप दृष्चिगोचर हुआ । अक्षरातीत श्री राज मुस्कराते हुए समक्ष खड़े थे ।

गोपाल मणि जी बहुत देर तक श्री राज के स्वरूप को मन्त्रमुग्ध होकर देखते रहे और उनके अंग-अंग की शोभा को अपने चित्त में बसाते रहे । उनकी शोभा व श्रृंगार वैसा ही था, जैसा श्री कुलजम सरूप के सागर ग्रन्थ में वर्णित है । गोपाल मणि जी की प्रसन्नता का कोई ठौर नहीं था ।

श्री राज ने कहा- हे पुष्पावती की आत्मा ! जिस कारण तुम अत्यन्त कष्ट उठाकर दिन-रात खोजती फिर रही हो, सो मेरा यह अखण्ड स्वरूप क्षर और अक्षर से परे है । तुम मेरी आनन्द शक्ति हो । मेरा एक ज्ञान स्वरूप पहले हो चुका है सो आगे तुम्हे मिलेगा और संसार में आने का सारा भेद कहेगा । अब तुम क्या चाहती हो ?

गोपाल मणि जी ने कहा- हे प्रियतम ! आप सदा के लिए मेरी आत्मा में आसन कर निवास कीजिए ।

गोपाल मणि जी को यथोचित आश्वासन देकर श्री राज अदृश्य हो गए । दर्शन के समय उनकी आयु 238 वर्ष थी और विक्रम सम्वत् 1854 (सन् 1797) चल रहा था ।

उस दुर्गम पहाड़ी से उतरकर गोपाल मणि जी एक सघन वन में आए और एक वृक्ष के नीचे बैठकर श्री सद्गुरु का चिन्तन करने लगे । तब आपको श्री निजानन्द स्वामी (श्री देवचन्द्र जी) के दर्शन हुए । श्री निजानन्द स्वामी ने उन्हें तारतम ज्ञान प्रदान किया और इश्क रब्द से लेकर जागनी ब्रह्माण्ड तक का सारा वृत्तान्त कह सुनाया, साथ ही उन्हें पद्मावती पुरी (पन्ना) जाने और जागनी कार्य करने का आदेश दिया ।

परमहंस गोपाल मणि जी की अन्तर्दृष्टि खुलने लगी । उन्हें परमधाम का भी अनुभव होने लगा । वे पांच दिन तक उसी आनन्द में मग्न रहे । तद्पश्चात् पद्मावती पुरी का स्मरण करके दक्षिण की ओर प्रस्थान कर दिया ।

वहां से चलकर परमहंस महाराज सरयू नदी के तट पर साहुन पुर ग्राम पहुंचे, जहां सर्वप्रथम उनकी भेंट सुन्दर दास नामक सुन्दरसाथ से हुई जिन्होंने अपनी बाल्यावस्था में छत्रसाल जी से तारतम लिया था ।

कुछ दिन वहां रहकर गोपाल मणि जी पद्मावती पुरी (पन्ना) पहुंच गए । उन्होंने श्री प्राणनाथ मन्दिर का दर्शन किया और वहां पन्द्रह दिन निवास किया । श्री प्राणनाथ से प्रेरणा पाकर वे प्रयाग क्षेत्र में जागनी करने के लिए निकल पड़े ।

जागनी लीला

भैयां ग्राम (प्रयागराज) के एक-दो निवासियों को स्वप्न में परमहंस गोपाल मणि जी के दर्शन हुए और वह उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो गए । प्रातः होने पर गांव के तीन लोग परमहंस महाराज को ढूंढने के लिए वन में प्रवेश कर गए । अन्न-जल ग्रहण किए बिना वे पूरी श्रद्धा से पूरा दिन उन्हें खोजते रहे, तब रात्रि में महाराज जी ने उन्हें दर्शन दिया ।

गोपाल मणि जी उसी वन में कुटिया बनाकर रहने लगे । कई ग्राम के लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे । उनके अन्दर ऐसी आकर्षण शक्ति थी कि लोगों का घर लौटने का मन ही नहीं करता था । अतः ग्राम वासियों ने उनसे निवेदन किया कि वे ग्राम के अन्दर ही निवास करें । तब परमहंस महाराज ने भैयां ग्राम को पवित्र जानकर वहां अपना आसन लगा लिया । उस समय सन् 1801 चल रहा था और उनकी आयु 242 वर्ष थी ।

परमहंस महाराज ने वहां अनेक परिवारों को सुन्दरसाथ में शामिल किया । भैयां गांव के लोग सदैव उनकी सेवा में अर्पित रहते थे । मौजा नेवादा के पण्डित शिवपाल के पुत्र अयोध्या प्रसाद उन पर पूर्ण रूप से समर्पित थे, जिनका नाम बाद में आनन्द दास पड़ गया । इसके अतिरिक्त शाहपुर, चंधास, सींकी, भभउर, घेवसाही, बसुही, कोश्फरा, पसना, वभनपटी, मई, वर्षवलि, इत्यादि ग्रामों के सुन्दरसाथ भी महाराज जी की चर्चा सुनने आने लगे ।

जब अनेक सुन्दरसाथ और साधू-सन्त वहां आने लगे, तो एक स्थायी भवन की आवश्यकता महसूस हुई । सन् 1804 में परमहंस गोपाल मणि से आज्ञा पाकर सुन्दरसाथ ने भैयां ग्राम में एक मन्दिर का निर्माण करवाया । उस परिसर के अन्दर आगन्तुकों के निवास के लिए एक बंगला भी बनाया गया । परमहंस महाराज पन्ना से श्री कुलजम सरूप ले आए और उसकी सेवा मन्दिर में पधरा दी गई । मन्दिर के तीन तरफ सुन्दरसाथ ने अपने घर बना लिए और वहीं सपरिवार निवास करने लगे ।

परमहंस गोपाल मणि

मन्दिर में वाणी चर्चा व कीर्तन के कार्यक्रम होने लगे । अनेक स्थानों से श्रद्धालुजन वहां आने लगे । वह स्थान जागनी का केन्द्र बन गया । इस स्थान का महत्व इतना फैल गया कि बात मांडा प्रान्त के राजा क्षत्र पाल सिंह के कानों तक पहुंच गई । उन्होंने सुना कि भैयां ग्राम में एक महात्मा आए हैं जो पौराणिक मान्यताओं से अलग बात करते हैं, जो जीव और आत्मा को अलग मानते हैं, तीन तरह की सृष्टि बताते हैं, ब्रह्म को संसार से अलग मानते हैं । तब उन्होंने दो विद्वान पण्डितों को सत्य जानने और सनातन परम्परा को स्वीकार करवाने के लिए भैयां ग्राम भेजा ।

राजा द्वारा भेजे गए पण्डित भैयां ग्राम में शास्त्रार्थ करने के उद्देश्य से पहुंचे । उनकी मंशा समझकर परमहंस गोपाल मणि जी ने एक बालक का रूप बना लिया और मन्दिर के बाहर अन्य बालकों के साथ खेलने लगे । जब दोनों पण्डित वहां पहुंचे और महात्मा जी के विषय में पूछने लगे, तो बालक रूपी परमहंस महाराज उन्हें अपने साथ मन्दिर की परिसर में उस स्थान तक ले गए जहां उनका आसन था ।

अपने आसन के निकट पहुंच कर बालक रूपी परमहंस महाराज स्वयं उस आसन पर विराजमान हो गए और उनका रूप बालक से युवा और फिर वृद्ध में परिवर्तित हो गया । यह सब लीला देखकर दोनों विद्वान चकित रह गए और उनके चरणों में नतमस्तक होकर उनकी अस्तुति करने लगे । परमहंस महाराज ने दोनों विद्वानों से कहा कि आप लोग जिस कार्य के लिए आए थे, वही करिए । तब दोनों ने लज्जित होकर उनसे क्षमा मांगी और वापस राजा के पास लौट गए ।

जब राजा ने अपनी पण्डितों से सारी बात सुनी, तो वह परमहंस महाराज के दर्शन के लिए भैयां ग्राम आया । राजा ने महाराज जी के चरणों में प्रणाम करके एक ताम्र पत्र भेंट किया । महाराज जी ने पूछा कि यह ताम्र पत्र क्या है ? राजा ने बताया कि वह उन्हे पांच सौ एकड़ भूमि अर्पित करना चाहता है । परमहंस महाराज ने भूमि लेने से मना कर दिया और राजा को समझाया कि भविष्य में लोग मन्दिर की भूमि भी छीन लेंगे और साधु-महात्मा भी अनाचार करेंगे । राजा का भाव रखने के लिए महाराज जी ने सिर्फ एक मुट्ठी अन्न मन्दिर की सेवा के लिए स्वीकार किया ।

भैयां मन्दिर में सदैव मेला लगा रहता था । लोगों को ऐसा लगता था, जैसे फिर से ब्रज की लीला हो रही है । किसी का घर जाने का मन ही नहीं करता था । महाराज जी की चर्चा सुनकर सुन्दरसाथ मुग्ध हो जाते थे । इस नश्वर ब्रह्माण्ड का रचना विज्ञान, तीन तरह की सृष्टि का वर्णन, श्री कृष्ण की त्रिधा लीला, तथा ब्रज, रास और जागनी लीला, आदि विषयों को सुनकर सबकी अज्ञानता लुप्त हो जाती थी । अपनी चर्चा में वे क्षर, योगमाया, अक्षर धाम और परमधाम का सम्पूर्ण वर्णन किया करते थे ।

बिहरिया ग्राम में एक सुन्दरसाथ रहते थे लाल बैजनाथ सिंह । एक दिवस वे भैयां ग्राम में आयोजित किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए निकले । तेज वर्षा हो रही थी और नदी में बाढ़ आई हुई थी । मल्लाह ने नाव ले चलने से मना कर दिया । तब लाल बैजनाथ सिंह सद्गुरु महाराज का नाम लेकर नदी में कूद गए । वह एक मील तक बहते रहे, तभी अचानक किसी प्रकार वे नदी के उस पार पहुंच गए ।

रात्रि हो गई थी और लाल बैजनाथ सिंह मार्ग भटक गए । तब परमहंस गोपाल मणि जी ने कुछ सुन्दरसाथ को हरगड़ ग्राम के पश्चिम में स्थित जंगल से उन्हें ढूंढकर लाने के लिए भेजा । इस प्रकार वह सुरक्षित भैयां मन्दिर पहुंच गए और कार्यक्रम में भाग लिया ।

तद्पश्चात् परमहंस महाराज ने उन्हें बुलाकर पूछा कि जब नदी में प्रवेश किया था, तब क्या हुआ था ? यह सुनकर वह भयभीत हो गए और बताने लगे कि वह डूब रहे थे, तब किसी ने आकर उन्हें बचाया था । परमहंस महाराज ने अपनी कफनी खोलकर दिखाई, तो उनके शरीर पर कीचड़ लगा हुआ था । लाल बैजनाथ सिंह समझ गए कि महाराज जी ने ही उसके प्राण बचाए थे । उसने महाराज जी को कष्ट पहुंचाने के लिए उनसे क्षमा मांगी ।

परमहंस गोपाल मणि जी ने दो ग्रन्थों की भी रचना की है - ब्रह्म बृहद् पत्रिका और रसानन्द सागर ।

पन्ना के सुन्दरसाथ ने परमहंस महाराज जी के निमित्त गुम्मट जी के पास एक गुफा बनवा दी । जब कभी वे पन्ना जाते थे, तो वहीं रहकर ध्यान-चितवन करते थे । उसी गुफा के ऊपर उनके आश्रम का निर्माण हुआ, जो पुरानी शाला के नाम से विख्यात है ।

रीवा प्रान्त में पदार्पण

परमहंस गोपाल मणि जी ने सन् 1821 में पहली बार रीवा प्रान्त में चरण धरे । वहां पर उनके द्वारा अनेक आत्माओं की जागनी हुई, जिसमें मुख्य नाम साधू बाबा का आता है । टिकुरी ग्राम के निकट बहुत सुन्दर प्राकृतिक स्थल था, जहां परमहंस महाराज ने अपना आसन लगा लिया । दुबगवां ग्राम निवासी मौजम बाबा ने टिकुरी के उस उपवन में महाराज जी के लिए एक कुटिया का निर्माण करवा दिया और सदैव उनकी सेवा में तत्पर रहने लगा ।

टिकुरी में आसपास के गांवों से लोग आने लगे और वाणी चर्चा का लाभ लेने लगे । परमहंस महाराज के तेजस्वी स्वरूप को देखकर सभी बहुत प्रभावित होते थे और उन्हें अपने घर पर पधारने के लिए प्रार्थना किया करते थे । घर पर उनका स्वागत-सत्कार करते, भोजन करवाते तथा पूरा परिवार तारतम ग्रहण करके सुन्दरसाथ में शामिल हो जाता ।

आलमगंज निवासी आसाराम ने सुना कि टिकुरी में एक सिद्ध महात्मा पधारे हैं, तो वह दर्शन करने के लिए निकल पड़ा । घर के लोगों ने बहुत मना किया कि वहां मत जाओ, क्योंकि सुना है कि जो भी उनके पास जाता है, उस को शिष्य बना लेते हैं । आसाराम ने कहा कि वह शिष्यत्व ग्रहण नहीं करेगा, सिर्फ दर्शन करके लौट आएगा ।

टिकुरी पहुंचकर आसाराम ने परमहंस महाराज के चरणों में प्रणाम किया । साधू बाबा ने महाराज जी को उसका परिचय दिया । तब परमहंस महाराज बोले कि जो जहां का होता है, तहां खुद जाता है । इन वचनों को सुनकर आसाराम सोचने लगा कि शायद उसे शिष्य बनाने की बात चल रही है, इसलिए वह तुरन्त घर लौट आया ।

दो-चार दिन बाद उसे स्वप्न में परमहंस महाराज ने दर्शन देकर एक पत्री दी । उस पत्री को पाकर वह बहुत हर्षित हुआ और जोश में भजन गाने लगा । प्रातः उठकर वह घर वालों से बोला कि मुझे श्याम सुन्दर ने पत्री देकर बुलाया है, सो मुझे अवश्य जाना है । घर वालों ने बहुत रोका, परन्तु वह नहीं रुका । वह परमहंस महाराज के पास आकर उनके चरणों में प्रणाम करके रोने लगा । महाराज जी ने उसे रात्रि की पूरी घटना सुना दी । तब आसाराम ने परमहंस महाराज से तारतम ग्रहण किया और अपनी आत्मा को उनकी सेवा में अर्पित कर दिया ।

इस प्रकार परमहंस महाराज का दर्शन करने अनेक गांवों से लोग आने लगे । जब सुन्दरसाथ की संख्या में वृद्धि हो गई, तब सन् 1824 में आसपास के सुन्दरसाथ ने मिलकर वहां एक मन्दिर का निर्माण प्रारम्भ किया ।

मन्दिर के निर्माण में दुबगवां और सुनवर्षा ग्राम से बहुत सहायता मिली । उसमें भी सुनवर्षा ग्राम के तीन व्यक्ति बहुत सेवाभावी थे- राम प्रसाद, लहुराई राम और प्रहलाद । जब मन्दिर निर्माण का कार्य चल रहा था, तब सुन्दरसाथ दूर-दूर से लकड़ियां ढोकर ला रहे थे । प्रहलाद ने सद्गुरु महाराज का नाम लेकर छह गुना भार उठा लिया और सरलता से गन्तव्य तक पहुंचा दिया । जब सुन्दरसाथ सेवा के पश्चात् परमहंस महाराज को प्रणाम करने पहुंचे, तब वे प्रहलाद की तरफ देखते हुए बोले कि अब सुन्दरसाथ मुझसे बोझा भी ढुलवाने लगे । महाराज जी ने अपना कंधा दिखलाया, जो लाल पड़ गया था । यह देखकर सुन्दरसाथ बहुत दुःखी हुए । प्रहलाद ने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी ।

जब मन्दिर का निर्माण पूर्ण हुआ, तब वहां श्री कुलजम सरूप की सेवा पधरा दी गई । इसके पश्चात् सुन्दरसाथ की सुविधा के लिए वहां एक कुंआ भी खुदवा दिया गया । अब वहां चर्चा-सत्संग होने लगा । टिकुरी के अतिरिक्त दुबगवां, तिवनी, चन्देह, सुनवर्षा, खरहना, सतिनी, आलमगंज, बकिया, कपिशा, आदि गांवों से सुन्दरसाथ आने लगे और तारतम ज्ञान का बहुत प्रसार हुआ । सुन्दरसाथ के आग्रह पर परमहंस महाराज भी उपरोक्त गांवों में उनके घरों में पधारते थे । इस प्रकार उत्सव-भणडारे चलते रहते थे । साधू बाबा सदैव परमहंस महाराज के साथ रहते थे ।

एक दिवस मन्दिर के पुजारी ने श्री राज को गर्म दूध का भोग लगा दिया । परमहंस महाराज ने पुजारी को बुलाकर पूछा, तो वह अपनी भूल स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ । जब महाराज जी ने अपना मुख खोलकर दिखाया कि उनकी जीभ पर छाले पड़ गए हैं, तब पुजारी ने लज्जित होकर क्षमा मांगी ।

कई वर्ष टिकुरी मन्दिर में रहने के पश्चात्, परमहंस महाराज चलकर पन्ना में श्री प्राणनाथ मन्दिर के दर्शन के लिए निकल पड़े । कुछ मास वहां रहकर सब सुन्दरसाथ से मिले, शरद पूर्णिमा का कार्यक्रम देखा, वाणी चर्चा सुनाई ।

वहां से चलकर एक व्यापारी प्रेमसागर के निमन्त्रण पर मुकुन्दपुर ग्राम गए । साथ में साधु-सन्तों की मण्डली रहती थी । उस व्यापारी व ग्राम वासियों ने बहुत सत्कार किया । कुछ दिन वहां रहकर चर्चा-सत्संग करते रहे । परमहंस महाराज की ख्याति सुनकर आसपास के अनेक ग्रामों से लोग चर्चा सुनने आने लगे ।

जब परमहंस महाराज की महिमा के विषय में रीवा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह जुदेव ने सुना, तो उसने अपने युवराज रघुराज सिंह को उन्हें आमन्त्रित करने के लिए मुकुन्दपुर भेज दिया । युवराज द्वारा सविनय आग्रह करने पर महाराज जी सभी साधु-सन्तों के साथ रीवा के राजा के भवन में पधारे । राजा ने सबका यथोचित आदर-सत्कार किया और परमहंस महाराज को पांच गांव भेंट किए ।

परमहंस महाराज ने राजा से कहा कि यह धन-सम्पत्ति तुमको किसने दिया ? राजा ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि आप परब्रह्म स्वरूप ने ही सब कुछ दिया है । परमहंस महाराज ने पुनः कहा कि जब सब कुछ मेरा ही दिया हुआ है, तो तुम मुझे क्या दोगे । यह ऐश्वर्य, राज-पाट, धन, जमीन, इत्यादि वैराग्य के लिए बाधक है । मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता । यह बात सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुआ ।

कई दिन तक परमहंस महाराज द्वारा तारतम ज्ञान विषयक चर्चा होती रही, परन्तु अंकुर न होने के कारण राजा कुछ तत्व ज्ञान ग्रहण नहीं कर सका । फिर उसने परमहंस महाराज से आग्रह किया कि युवराज के शरीर पर सफेद दाग हैं, उसे कृपा करके मिटा दीजिए । परमहंस महाराज की कृपा से वह ठीक हो गए । पन्द्रह दिन वहां रहकर महाराज जी ने वहां से प्रस्थान किया ।

वहां से चलकर परमहंस महाराज दुबगवां अर्थात् टिकुरी स्थान पर आ गए । इस प्रकार टिकुरी में वे सात वर्ष तक रहे, जिस दौरान अनेक आत्माओं की जागनी हुई । सन् 1828 में साधू बाबा को टिकुरी मन्दिर की जिम्मेदारी सौंपकर परमहंस महाराज भैयां ग्राम लौट आए ।

टिकुरी मन्दिर में निवास के दौरान, परमहंस महाराज ने बूढ़ा ग्राम में एक वृक्ष के नीचे विश्राम किया था । उनके जाने के बाद, एक भ्रमणशील महात्मा जो दिन भर भ्रमण करते थे, रात्रि में सदैव उसी वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे । उस महात्मा के आचरण को हरि भगत राम नामक व्यक्ति ने समझ लिया ।

हरि भगत राम ने महात्मा से पूछा कि वे उसी वृक्ष के नीचे ही क्यों विश्राम करते हैं ? तब महात्मा ने बताया कि उस वृक्ष के नीचे एक सिद्ध पुरुष रुके थे, जिसके कारण वह भूमि बहुत पवित्र है और वहां रहने पर उनके मन को बहुत शान्ति मिलती है । हरि भगत राम ने पता लगा लिया कि कुछ दिन पूर्व तो उस वृक्ष के नीचे परमहंस गोपाल मणि जी रुके थे । उसे यह भी पता चला कि उनके परम शिष्य टिकुरी मन्दिर के पास कुटी बनाकर रहते हैं । तब हरि भगत राम ने साधू बाबा से तारतम लिया और श्री राज के चरणों में अपनी आत्मा को समर्पित कर दिया ।

टिकुरी मन्दिर में निवास के दौरान, परमहंस महाराज ने बकिया ग्राम में जागनी की थी । उस दौरान वहां का निवासी पण्डित प्रागदत्त विद्याध्ययन के लिए चित्रकूट गया हुआ था । जब वह लौट कर आया, तो उसे पता चला कि गांव में एक महापुरुष पधारे थे जो वेद, शास्त्र, पुराण और सभी आध्यात्मिक विद्याओं के परम ज्ञानी हैं । वह उनका दर्शन करने के लिए व्याकुल हो गया । उधर, उसी गांव के रघुवीर राम के मन में भी परमहंस महाराज की शरण में जाने की इच्छा थी । अब यह दोनों व्यक्ति साथ में भैयां के लिए निकल पड़े ।

मार्ग में पण्डित प्रागदत्त के मन में विचार आया कि जब परमहंस गोपाल मणि का तीर्थ स्थान श्री पद्मावती पुरी (पन्ना) में है, तो पहले वहां जाना चाहिए । पन्ना में उनके दर्शन, सिद्धान्त, आदि को समझकर, तब परमहंस महाराज से मन्त्र लेना चाहिए । रघुवीर राम तो परमहंस महाराज का दर्शन पहले ही कर चुका था, इसलिए उसके मन में कोई संशय नहीं था । अतः दोनों व्यक्ति अलग-अलग दिशा में मुड़ गए । पण्डित प्रागदत्त पन्ना चला गया और रघुवीर राम भैयां ग्राम के लिए निकल पड़ा ।

भैयां मन्दिर पहुंच कर रघुवीर राम ने परमहंस महाराज के चरणों में प्रणाम किया और बकिया ग्राम का समाचार सुनाकर अपनी तारतम लेने की इच्छा व्यक्त की । परमहंस महाराज ने उसके आग्रह को स्वीकार करते हुए पूछा कि तुम्हारे साथ जो व्यक्ति था, वह कहां गया ? रघुवीर ने महाराज जी को पूरा वृत्तान्त सुना दिया । तब महाराज जी बोले कि प्रागदत्त को पद्मावती पुरी से तारतम मिलना था, इसलिए वह वहां चला गया । इसके बाद रघुवीर ने परमहंस महाराज से तारतम ग्रहण किया और कुछ दिन रहकर घर लौट आया ।

जब प्रागदत्त पन्ना पहुंचा, तो गुम्मट मन्दिर में उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे श्री प्राणनाथ साक्षात् विराजमान हैं । उसके मन में अटूट श्रद्धा उत्पन्न हो गई । वह बार-बार दण्डवत् प्रणाम करने लगा । उसने मन्दिर के कामदार नत्थू राम जी से तारतम लिया और एक मास तक चर्चा-सत्संग का लाभ लेकर लौट आया ।

बकिया ग्राम में दोनों सुन्दरसाथ की भेंट हुई । तब रघुवीर ने प्रागदत्त को पूरा वृत्तान्त सुनाया कि जब वह भैयां में परमहंस महाराज के चरणों में पहुंचा, तो महाराज जी ने प्रागदत्त के विषय में पूछा था कि वह कहां चला गया । यह जानकर प्रागदत्त को बहुत आश्चर्य हुआ और उसके मन में भी परमहंस महाराज के प्रति भाव उत्पन्न होने लगे तथा वह उनके दर्शन की कामना करने लगा ।

जागनी यात्रा

सात वर्षोंपरान्त सन् 1828 में, जब परमहंस गोपाल मणि जी रीवा से भैयां लौटे, तो उनके दर्शन करने वालों की भीड़ लग गई । आसपास के अनेक गांवों से लोग उनके दर्शन करने एवं चर्चा सुनने के लिए आने लगे । दो वर्ष तक वहां रहकर, सन् 1830 में परमहंस महाराज पश्चिम दिशा में जागनी के लिए मण्डली के साथ निकल पड़े । उस समय उनकी आयु 271 वर्ष थी ।

इस यात्रा के दौरान परमहंस महाराज ने मई, वर्शवलि, रामपुर, डेरा, बिहरिया, खुझवा, बड़गड़, आदि अनेक गांवों में भ्रमण किया । हर गांव में कुछ दिन रुककर, वे तारतम ज्ञान का प्रसार व आत्माओं की जागनी करते गए । जब भी वह एक गांव से प्रस्थान करते, तो ग्रामवासी अश्रुओं से भावपूर्ण विदाई देते ।

जब परमहंस महाराज खुझवा ग्राम के पश्चिम तरफ तालाब पर पहुंचे, तो बोले कि ऐसा लगता है इस ग्राम में ब्रह्मसृष्टियां हैं, उनके अवश्य जाग्रत करना है । अतः उन्होंने वहीं पर आसन लगा लिया । सुन्दरसाथ उस ग्राम में गए और सबको महाराज जी के आने की सूचना दी । उस समय ग्राम में शीत की भयंकर बीमारी फैली हुई थी, जिसके कारण सब तरफ सन्नाटा फैला हुआ था ।

जब वहां के निवासी परमहंस महाराज के चरणों में आए, तब महाराज जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि आज से यह बीमारी समाप्त हो जाएगी । पूरे वातावरण में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और लोगों को धैर्य हुआ । उस दिन से बीमारी भी समाप्त हो गई और गांव में ब्रह्मज्ञान की चर्चा का रस बहने लगा ।

जब परमहंस महाराज बड़गड़ ग्राम में नदी के किनारे एक आम के बाग में रुके हुए थे, वहां उनका दर्शन करने अनेक लोग पधारे, जिसमें से एक जगन्नाथ लाल के अन्दर उन्होंने परमधाम की आत्मा को पहचान लिया । परमहंस महाराज ने उससे पूछा कि जगन्नाथ जी, संसार में क्या आनन्द है, कभी परात्म को याद करते हो ?

जगन्नाथ ने आगे बढ़कर परमहंस महाराज के चरणों में प्रणाम किया और कहा कि वह उनका आशय नहीं समझ सका । तब महाराज जी ने उसे परमधाम से लेकर ब्रज, रास और जागनी लीला का सारा रहस्य समझाया । यह सब बातें सुनकर वह चौंक गया और उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह किसी नींद से उठा हो । इसके पश्चात् उसने अपना तन, मन, धन परमहंस महाराज के चरणों में अर्पित कर दिया । जागनी यात्रा के दौरान परमहंस महाराज के जीवन में ऐसे अनगिनत प्रसंग घटे ।

एक वर्ष तक यात्रा करते हुए वे चित्रकूट से होते हुए पन्ना पहुंच गए । गुम्मट-बंगला मन्दिर का दर्शन करके तथा कुछ दिन अपने आश्रम (पुरानी शाला) में रहकर, सन् 1831 में वे वापस भैयां मन्दिर लौट आए ।

दूसरी बार रीवा प्रान्त में पदार्पण

रीवा प्रान्त के सुन्दरसाथ द्वारा बार-बार आग्रह करने पर, सन् 1837 में परमहंस गोपाल मणि जी दूसरी बार रीवा के लिए निकले । साधु-सन्तों की मण्डली के साथ परमहंस महाराज भैयां से निकलकर बूढ़ा ग्राम पहुंचे । बूढ़ा ग्राम में हरि भगत राम के घर पधारे । हरि भगत राम और उसके परिवार ने उनके चरण धोकर, आरती-पूजा करके बहुत श्रद्धापूर्वक उनका स्वागत किया । गांव के अन्य लोग भी उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़े । परमहंस महाराज दो दिन तक वहां रुके ।

बूढ़ा ग्राम से चलकर परमहंस महाराज दुबगवां अर्थात् टिकुरी मन्दिर पहुंचे । साधू बाबा ने उनके चरणों में दण्डवत् प्रणाम करके उनके चरण धोकर चरणामृत लिया और तब परमहंस महाराज अपने आसन पर विराजमान हुए । टिकुरी मन्दिर में वाणी चर्चा व सत्संग का कार्यक्रम चलने लगा । परमहंस महाराज की चर्चा सुनने और दर्शन पाने के लिए अनेक ग्रामों से लोगों की भीड़ लग गई ।

एक मास तक टिकुरी मन्दिर में रहने के पश्चात्, सुन्दरसाथ के निवेदन पर, परमहंस महाराज गांव-गांव में भ्रमण करने लगे । उन्होंने दुबगवां, सुनवर्षा, चंदेह, आबी, बेलवा, तिवनी, आलमगंज, कपिशा, बकिया, आदि ग्रामों में जा-जाकर जागनी करी । हर गांव में दो-चार दिवस रुककर वे आगे बढ़ जाते ।

जब बकिया ग्राम के सुन्दरसाथ ने सुना कि परमहंस महाराज आ रहे हैं, तो सबके मन में प्रेम की तरंगें उठने लगीं । सभी अपने-अपने गृह की सजावट करने लगे, द्वार पर दीपक, ध्वजा, तोरण लगाने लगे । सबके हृदय में यह चाहना थी कि पहले मेरे घर में पधारें ।

परमहंस महाराज अन्तर्यामी थे, सो अनेक रूप धारण करके सबके घर पर एक साथ पधारे । सभी लोगों ने अपने-अपने घर पर पांवड़ा बिछाकर और स्त्रियों ने मंगल गीत गाकर उनका स्वागत किया । महाराज जी को सुन्दर आसन पर बैठाया, दण्डवत प्रणाम किया, चन्दन-पुष्प आदि से पूजन किया, आरती और प्रदक्षिणा किया, बहु व्यञ्जनों से सजा थाल लाकर भोग लगाया, चरणामृत-प्रसाद लिया । सब सुन्दरसाथ ने परमहंस महाराज को श्री राज का स्वरूप मानकर पूर्ण श्रद्धा से सेवा करी ।

इसके पश्चात् ग्राम के बाहर टवस नदी के किनारे एक मण्डप बनाया गया, जहां परमहंस महाराज ने अपनी साधु मण्डली के साथ निवास किया । वहां पर बहुत वाणी चर्चा व सत्संग का कार्यक्रम हुआ । सब सुन्दरसाथ प्रतिदिन आ-आकर उसका लाभ लेते । उस स्थान पर दो मास तक निवास किया और बहुत आत्माओं को जाग्रत किया ।

इसी स्थान पर तिघरा ग्राम के कामता राम भी परमहंस महाराज के दर्शन के लिए आए, चर्चा श्रवण किया, आत्मा जाग्रत हुई, कई दिनों तक महाराज जी के साथ रहे और समस्त निधि ले गए । यही बाद में बाबा कामता दास के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने महाराष्ट्र में बहुत जागनी की और परमहंस महाराज की परम्परा को आगे बढ़ाया ।

बकिया ग्राम के पण्डित प्रागदत्त के मन में भी वैराग्य उत्पन्न हो गया और उन्होंने विरक्त भेष धारण कर लिया । अब से उनका नाम बाबा प्रागदास हो गया । उन्होंने भी अनेक आत्माओं तक तारतम ज्ञान का अमृत पहुंचाया ।

बकिया ग्राम की वह सुन्दर भूमि, जहां तीन तरफ नदी बहती है और बीच में आम के बाग हैं । उसी बाग के बीच में एक पर्ण कुटीर में दो मास तक परमहंस महाराज ने निवास किया था । इस दौरान उनके मुख से ब्रह्मज्ञान की वर्षा होती रही । अब उनके जाने के समय सुन्दरसाथ बहुत भावुक हो गए और अश्रुपूर्ण विदाई दी ।

बकिया से परमहंस महाराज ने रीवा नगर के राजा विश्वनाथ सिंह को पत्र लिखकर बाबा प्रागदास के हाथ से भेजा, जिसमें माया को छोड़ने का उपदेश दिया गया था । अंकुर न होने के कारण राजा ने विशेष रुचि नहीं दिखाई । तब सेठ प्रेम सागर के निवेदन पर परमहंस महाराज ने मुकुन्दपुर चलना स्वीकार किया ।

जब परमहंस महाराज बकिया से चले, तो उनके साथ साधू बाबा, बाबा प्रागदास, कुछ साधु-सन्त व बकिया के कुछ सुन्दरसाथ भी चले । महाराज जी को मुकुन्दपुर में प्रेम सागर के बाग में पहुंचाकर बकिया के सुन्दरसाथ लौट आए । प्रेम सागर के परिवार ने सबका बहुत स्वागत-सत्कार किया । दो दिवस वहां रहकर रीवा नगर में भण्डारी के घर पर गए ।

जब रीवा नगर के दीवान मथुरा प्रसाद को पता चला कि परमहंस महाराज पधारे हैं, तो वह मन्त्री नन्दराम के साथ उनसे मिलने आया । दोनों ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि हमारे बाग में पधारिए । इस प्रकार पांच दिवस भण्डारी के यहां रहने का बाद, परमहंस महाराज व सभी सुन्दरसाथ दीवान मथुरा प्रसाद के बाग में पधारे । दोनों व्यक्ति तन, मन, धन से उनकी सेवा में लग गए ।

जब राजा विश्वनाथ सिंह को पता चला, तो वह भी दर्शन करने आया । राजा ने दीवान को आदेश दिया कि परमहंस महाराज की सेवा में राजकोष से प्रतिदिन तीस रुपए और एक मन अबीर देना ।

इस वर्ष होली का त्यौहार रीवा नगर में मनाया गया । दूर-दूर से बहुत सुन्दरसाथ और रीवा नगर की जनता इस अवसर पर परमहंस महाराज का दर्शन करने आए । सुन्दरसाथ ने फाग व बसन्त के गीत गाए । वहां एकत्रित हुई भीड़ पर परमहंस महाराज अपने हाथों से अबीर उछालते और पिचकारी चलाते । जिस व्यक्ति को रंग लग जाता, वह अपने को धन्य-धन्य समझता ।

परमहंस महाराज ने रीवा नगर में डेढ़ मास तक निवास किया । जब वह विदा होने लगे, तो दीवान मथुरा प्रसाद और रीवा नगर की जनता के मुख पर उदासी दिखती थी । यहां से महाराज जी टिकुरी के लिए निकल पड़े ।

इस समय परमहंस महाराज की वेश-भूषा बहुत आकर्षक है । उनके गले में छोटी व बड़ी माला, कटि में कौपीन, ऊपर श्वेत रंग का अंचला, ऊपरी शरीर पर श्वेत रंग की चादर, सिर पर केश, तथा चरण में पादुका है । उनके एक हाथ में छड़ी, दूसरे हाथ में सुमरिणी, तथा बगल में तुम्बा पात्र है । इस तरह सनकादिक भेष धारण करके चटकनी चाल से चले जाते हैं । उनके साथ चलने वाले सभी साधु-सन्तों का भी ऐसा ही भेष है ।

अनेक पुरों और ग्रामों में आत्माओं को ढूंढते हुए यह मण्डली टिकुरी मन्दिर पहुंची । कुछ काल तक टिकुरी में निवास किया ।

उरुआ ग्राम में सन्यासियों का एक मठ था । वहां के पीठाधीश राधिका पुरी नामक एक महात्मा थे । वह अपने शिष्यों के साथ भ्रमण करते हुए टिकुरी पधारे । परमहंस महाराज का दर्शन करते समय राधिका पुरी को अनुभव हुआ, जैसे अनेक सूर्यों की कान्ति लिए दिव्य स्वरूप आसन पर बैठा हो । वह दूर खड़े रहे क्योंकि उनका निकट जाने का साहस नहीं हो रहा था ।

तब परमहंस महाराज ने कहा कि हे ब्रह्मात्मा ! तुम अपने युत्थ में आओ, पीछे क्यों हटते हो । मैं तुम्हारी खोज में फिरता हूं । तुम जगत में बहुत दिन तक भटके, अब तो अपनी परात्म को याद करो । दिव्य परमधाम में विराजमान अपनी आत्मा के वल्लभ श्री राज को याद करो । स्वप्न के समान नश्वर इस संसार के मोह, माया, लोभ, अहंकार का परित्याग करो । अपने निज स्वरूप और अखण्ड सुखों को याद करो ।

यह सुनकर राधिका पुरी चौंक गए और परमहंस महाराज के चरणों में बार-बार प्रणाम करने लगे । उनके निवेदन पर परमहंस महाराज ने उन्हें तारतम प्रदान किया । सन्यास भेष को त्याग कर उन्होंने महाराज जी जैसे श्वेत वस्त्र धारण कर लिए और उस दिन से उनका नाम बाबा राधिका दास हुआ । उन्होंने टिकुरी में रहते हुए अनेक आत्माओं को जगाया और पूर्ण श्रद्धा से सेवा करी । बाद में भ्रमण करते हुए वे कानपुर पहुंचे और वहां अनेक परिवारों को सुन्दरसाथ में शामिल किया ।

इस टिकुरी स्थान पर अनेक महात्मा हो गए, जैसे- बाबा कामता दास, बाबा श्याम दास, बाबा राधिका दास, बाबा प्राग दास, बाबा दर्शन दास, बाबा राव साहेब (सेमरी), बाबा कमरिहा दास, बाबा कल्याण दास, बाबा भजन दास, बाबा रधुवर दास, इत्यादि । इन सबके प्रमुख थे साधू बाबा ।

इस प्रकार सात वर्ष टिकुरी में रहने के बाद परमहंस महाराज फूलपुर भैयां जाने के लिए तैयार हो गए । उनको जाता देखकर सुन्दरसाथ बहुत व्याकुल होने लगे । तब परमहंस महाराज ने कहा कि किसी बात की चिन्ता मत करो । इस स्थान से बहुत आत्माएं जाग्रत होंगी । इस स्थान का पूज्य साधू बाबा को मानना, जिन्हें मैंने अपने हृदय में स्थान दिया है । इस तरह सबको समझाकर परमहंस महाराज भैयां आ गए ।

साधू बाबा व कुछ सुन्दरसाथ उन्हें भैयां मन्दिर छोड़ने आए और कुछ दिन रहकर वापस लौट गए ।

फूलपुर भैयां में निवास

परमहंस महाराज सन् 1844 में फूलपुर भैयां लौटे । उस समय उनकी आयु 285 वर्ष थी । उनके लौटने पर वहां के सुन्दरसाथ को बहुत प्रसन्नता हुई । आसपास के गांवों से लोग उनका दर्शन करने के लिए आने लगे । महाराज जी के मुख से ब्रह्मज्ञान की चर्चा सुनकर सबकी आत्मा को बहुत सन्तोष हुआ ।

फूलपुर भैयां के मन्दिर की व्यवस्था गहवर साहि सम्भालते थे । उनकी अन्तिम इच्छा थी कि उनका शरीर काशी में छूटे । उन्होंने अपनी यह इच्छा परमहंस महाराज से कह दी और महाराज जी ने स्वीकृति भी दे दी । सन् 1851 में जब गहवर साहि का अन्तिम समय आया, तो परमहंस महाराज समझ गए । दो दिन पूर्व ही उन्होंने काशी जाने की इच्छा व्यक्त की । गहवर साहि और एक सज्जन को साथ ले लिया ।

उस समय गंगा नदी में उफान आया हुआ था, सो मल्लाहों ने चलने से मना कर दिया । तब परमहंस महाराज अपने योग बल से उन दोनों को लेकर नदी पार हो गए । उन दोनों को ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे कोई पुल पार किया हो, उनके कपड़े भी नहीं भीगे । दूसरे दिन काशी पहुंचकर परमहंस महाराज ने गहवर साहि को बताया कि आज तुम्हारे शरीर छोड़नेे का समय आ गया है । फिर उसे ज्ञानोपदेश दिया, जिससे शान्तिपूर्वक उसका शरीर छूट गया ।

सन् 1855 में फूलपुर भैयां मन्दिर में निवास करने वाले साधु-सन्तों ने विचार किया कि जब तक परमहंस महाराज हैं, तभी तक हमारी पूछ है । उनके बाद तो मन्दिर की व्यवस्था गृहस्थी सम्भाल लेंगे, तब हमें कौन पूछेगा ? इसी बात का समाधान ढूंढने में सब विचारमग्न थे । तब यह निर्णय हुआ कि यदि परमहंस महाराज के रहते हुए सन्तों का मन्दिर अलग हो जाए, तो अच्छा है । यह विचारकर उन्होंने बाबा जगन्नाथ दास को परमहंस महाराज को राजी करने की जिम्मेदारी सौंपी ।

अगले दिन बाबा जगन्नाथ प्रातः नौ बजे तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकले । परमहंस महाराज ने किसी सन्त से पूछा कि आज शैतान का चर्खा कहां है, दिखाई नहीं पड़ता ? तब उस सन्त ने उत्तर दिया कि वे तो आज आसन से उठे ही नहीं, अन्न त्याग कर बैठे हैं । परमहंस महाराज समझ गए कि इन लोगों ने कुछ योजना बना रखी है । उन्होंने बाबा जगन्नाथ को बुलवाया और पूरी बात सुनी । तब महाराज जी ने सन्तों को अलग सेवा-पूजा करने की स्वीकृति दे दी ।

परमहंस महाराज कभी सुन्दरसाथ से अधिक धन या सेवा की मांग नहीं करते थे । वे सभी सुन्दरसाथ से मन्दिर की सेवा-पूजा और साधु-सन्तों के लिए सिर्फ एक मुट्ठी अन्न का आग्रह करते थे ।

सन् 1860 में साधू बाबा का टिकुरी में धाम गमन हो गया । उस समय परमहंस महाराज वाणी चर्चा कर रहे थे । वे एकाएक रुक गए । उन्हें मौन देखकर सुन्दरसाथ विस्मित हो गए । तब वे बोले कि बहुत धोखा हो गया, साधू बाबा धाम चले गए । यह बात सुनकर सुन्दरसाथ को बहुत दुःख हुआ । साधू बाबा ने परमहंस महाराज के धाम गमन से पहले स्वेच्छा से अपने शरीर का त्याग किया था । यह उनकी अटूट श्रद्धा का परिचायक है । फिर परमहंस महाराज ने वाणी चर्चा जारी रखते हुए सुन्दरसाथ को धीरज प्रदान किया ।

जब किसी दूत को भेजकर पता करवाया गया, तो उसी घड़ी में साधू बाबा का धाम गमन हुआ था ।

धाम गमन

परमहंस गोपाल मणि जी ने धाम चलने से पहले ही अपने जाने की तिथि सब सुन्दरसाथ को बता दी थी । जब वह तिथि निकट आई, तब दूर-दूर से सुन्दरसाथ फूलपुर भैयां मन्दिर में एकत्रित हो गए ।

धाम गमन के दिन परमहंस महाराज प्रातः साढ़े चार बजे ध्यान लीन हो गए । यह देखकर सुन्दरसाथ व्याकुल होकर रुदन करने लगे । कुछ लोग बेहोश भी हो गए । दोपहर बारह बजे परमहंस महाराज ध्यान से उठे तो देखा कि सब सुन्दरसाथ उन्हें घेरकर विलाप कर रहे हैं ।

परमहंस महाराज ने कहा- हे मेरे प्यारे सुन्दरसाथ ! आप सब दुःखी क्यों हो रहे हैं ? मैंने तो आपको पहले ही अपने चलने की तिथि बता दी थी, फिर आप लोग मेरे धाम जाने में अड़चन क्यों डाल रहे हैं ? क्या यह जगत् अखण्ड है, जिसमें मैं सदा कायम रहूं ? यह निश्चित् जानो कि मुझे इस शरीर को छोड़कर जाना ही होगा । इस नश्वर ब्रह्माण्ड में जो आता है, उसे जाना ही पड़ता है । अब मेरा कार्य पूरा हो गया है ।

महात्मा आनन्द दास ने पूछा- हम लोगों के लिए क्या आज्ञा है और यह मन्दिर कैसे चलेगा क्योंकि अभी तक इसका कोई इन्तजाम नहीं हुआ है ?

परमहंस महाराज ने उत्तर दिया- मैं आप लोगों के सिर पर धर्म का भार छोड़कर जाता हूं, सो आपको पूर्ण करना होगा । यह मन्दिर मुट्ठी के आधार पर चलेगा । मेरे शरीर को मिट्टी में दाह करना ।

इस प्रकार परमहंस महाराज कई विषयों पर सन्तों को उपदेश देते रहे । जब चार बजे, तब उन्होंने एकाएक पृथ्वी को हाथ से ठोका और वहां पर तेज प्रकाश उत्पन्न हुआ । सबके नेत्र चकाचौंध हो गए । प्रकाश छंटने के बाद देखा गया तो वहां पर कोई नहीं था, अर्थात् परमहंस महाराज सशरीर ओझल हो गए थे । यह घटना सन् 1861 में हुई, जब परमहंस महाराज की आयु 302 वर्ष थी ।

उनके धाम गमन के बाद फूलपुर भैयां और टिकुरी मन्दिर में गादी पर साधु-महात्मा बैठने लगे और परम्परागत ढंग से कार्य चलता रहा ।

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