परमहंस कामता दास | Kamta Das
परमहंस गोपाल मणि जी ने रीवा प्रान्त में तारतम ज्ञान का बहुत प्रचार किया । सन् 1837 में जब वे दूसरी बार रीवा प्रान्त में पधारे, तो गांव-गांव में जाकर वाणी चर्चा व सत्संग करने लगे । उस दौरान उन्होंने बकिया ग्राम में दो मास तक निवास किया ।
बकिया ग्राम के पास तिघरा नाम का एक ग्राम है, जहां कामता राम रहते थे । जब उन्होंने सुना कि बकिया ग्राम में कोई सिद्ध महापुरुष पधारे हैं, तो वे परमहंस महाराज का दर्शन करने के निमित्त आए । कामता राम ने दर्शन करके महाराज जी के चरणों में दण्डवत् प्रणाम किया ।
परमहंस महाराज ने उनका आनन्द मंगल पूछा । तदोपरान्त वेद, शास्त्र, पुराण, आदि के प्रमाणों से आत्मा अर्थात् ब्रह्मसृष्टि की पहचान बताई, माया और ब्रह्म के विषय में बताया, क्षर-अक्षर से परे परमधाम का वर्णन सुनाया, तीन प्रकार की सृष्टि, तथा ब्रज, रास और जागनी लीला के विषय में बताया । इस तरह से जब भली प्रकार से वर्णन करके सुनाया, तो कामता राम के मन में बात दृढ़ता से बैठ गई । उनके मन में परमहंस महाराज के लिए अपार श्रद्धा उत्पन्न हो गई ।
कामता राम ने परमहंस महाराज से तारतम ग्रहण करने की इच्छा जाहिर की । तब परमहंस महाराज के आदेश से साधू बाबा ने कामता राम को तारतम दिया । कुछ दिन तक कामता राम परमहंस महाराज की सेवा में रहे, फिर कुछ काल घर में निवास किया । अब माया के काम में उनका मन लगता नहीं था और विरह-वैराग्य बढ़ने लगा । तब उन्होंने साधू बाबा को अपने घर बुलवाकर पूरे परिवार को तारतम दिलवाया और स्वयं विरक्त होकर गृह त्याग कर निकल पड़े । उस दिन से उनका नाम बाबा कामता दास हुआ ।
बाबा कामता दास ने कुछ काल तक परमहंस महाराज के साथ जागनी यात्रा में भ्रमण किया । तद्पश्चात् महाराष्ट्र के खान देश (नाशिक व आसपास के क्षेत्र) में जाकर बहुत जागनी का कार्य किया । परमहंस गोपाल मणि और साधू बाबा की परम्परा को आगे बढ़ाने का कार्य बाबा कामता दास ने किया । उन्होंने अनेक आत्माओं को तारतम ज्ञान देकर माया के बन्धन से मुक्त करवाया, जिसमें प्रमुख नाम नारायण दास का है जो सोनगीर में निवास करते थे ।
